अलवर के एक शख्स ने गोमूत्र और गोबर से अपने पक्के मकान को पुतवा दिया। इस शख्स ने यह कदम गाय के प्रति प्रेम और गोबर तथा गोमूत्र के लाभ को देखते हुए किया है।
अलवर कृषि मंडी के सचिव विष्णुदत्त शर्मा अपने गोप्रेम के कारण चर्चित है। वे करीब 15 साल से गोसंरक्षण से जुड़े हुए है। इस दौरान उन्होंने 80 से अधिक स्थानों पर गाय बचाने के लिए यज्ञ और कथा वाचन भी किया है। इससे होने वाली कमाई को भी गोशालाओं में दान दे देते है।
बेंगू तहसील के बनोड़ा बालाजी स्थल, रावतभाटा तहसील के कोटडा बालाजी, भीलवाड़ा के सवाई भोज स्थल, श्रीमाधोपुर, बांसवाड़ा के त्रिपुर सुन्दरी, चित्तौड़गढ़ सहित कई स्थान शामिल हैं जहां उन्होंने यज्ञ और कथाएं की है। उन्होंने जयपुर सहित टोंक, हनुमानगढ़, कोटा, रावतभाटा, चित्तौड़गढ़, उदयपुर और जोधपुर में सैकड़ो गो—सेवक तैयार किए, जो आज गोरक्षार्थ सेवा में जुटे हैं।
गोबर और गोमूत्र के महत्व को देखते हुए विष्णुदत्त ने अपने पक्के मकान को इनसे पुतवा रखा है। उन्होंने बताया कि ऐसा करने से गाय के प्रति उनकी आस्था और अधिक बढ़ती है। साथ ही घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ऐसा करने से मच्छरों का प्रकोप कम होता है और रेडिएशन का असर नहीं होता।
गाय के गोबर से बना सकते हैं धूपबत्ती
गोबर से बनाई गणेश मूर्तियों के साथ विष्णुदत्त
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विष्णुदत्त के अनुसार गाय के गोबर से विभिन्न वस्तुएं बनाकर प्रति महीने दस हजार रुपए तक कमा सकते हैं। उन्होंने बताया कि एक गाय दिनभर में 8—10 किलो गोबर देती है। इसमें पांच किलो लकड़ी का बुरादा, आधा किलो चंदन पाउडर, आधा लीटर नीम का रस, दस टिकिया कपूर, ढाई सौ ग्राम सरसों व जौ का आटा और तीन बार उबला हुआ ढाई सौ ग्राम गोमूत्र मिला लें। इंजेक्शन की सिरिंज को आगे से काटकर इस मिश्रण को उसके सांचे में डालकर निकालें तो धूपबत्ती तैयार हो जाती है। उन्होंने गाय के गोबर से गणेश प्रतिमाएं भी बनाई हैं। विष्णुदत्त ने उड़ीसा के पंडित वेणुधर दास के साथ मिलकर गोबर, गोमूत्र और चुटकीभर नमक से बिजली बनाने का दावा भी किया है।
गो—हत्या से जागी गो—सेवा की भावना
विष्णुदत्त शर्मा ने बताया कि कत्लखाने के लिए हो रही गायों की हत्याएं और बढ़ती तस्करी ने उनके मन में गोसेवा की भावना जागृत की। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें आजादी की तिथि भूलो मति, छिलके वाली का पति, भूरेठिया की मानू रे, गोभक्त गोविंदगिरी कथा प्रमुख है। वे कई जगहों पर गोबर से मूर्तियां, धूपबत्ती, गमले, पूजन सामग्री व अन्य वस्तुओं को बनाने के प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित कर चुके हैं।