भवानीपुर सीट पर BJP की जीत में राजस्थान और मारवाड़ी फैक्टर अहम रहा। राजेंद्र राठौड़ और संघ के सोमकांत शर्मा ने बूथ स्तर तक माइक्रो मैनेजमेंट संभाला। हिंदी-मारवाड़ी वोटरों को साधने और मजबूत संगठनात्मक रणनीति ने चुनावी माहौल बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।
सिर्फ बंगाल ही नहीं बल्कि बंगाल में बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे शुभेंदू अधिकारी की जीत के पीछे राजस्थान और राजस्थानी फैक्टर का रोल अहम रहा। वे न सिर्फ बंगाल में बीजेपी का चेहरा थे बल्कि उन्होंने ममता बनर्जी को उनके गढ़ में मात दी। शुभेंदू का पूरा चुनावी कैंपेन राजस्थान के नेताओं के जिम्मे था। वहीं यहां के चुनावी नतीजों पर मारवाड़ी और हिंदी भाषी वोटरों की भूमिका अहम रही। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की इस सबसे चर्चित और हाईप्रोफाइल भवानीपुर सीट पर बीजेपी की सियासी रणनीति की चर्चा अब राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा है। इस सीट की पूरी चुनावी जिम्मेदारी राजस्थान भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ को सौंपी गई थी। राठौड़ इस सीट पर बीजेपी की तरफ से प्रभारी लगाए गए थे। राठौड़ का दावा है कि भाजपा ने बूथ स्तर तक माइक्रो-मैनेजमेंट और संगठनात्मक रणनीति के दम पर टीएमसी के मजबूत गढ़ में माहौल बदल दिया।
भवानीपुर: ‘मिनी इंडिया’ सीट जहां हिंदी-मारवाड़ी वोटर्स ने बदला चुनावी गणित
कोलकाता की भवानीपुर विधानसभा सीट को पश्चिम बंगाल की सबसे सामाजिक रूप से विविध सीटों में गिना जाता है। यही वजह है कि इसे अक्सर मिनी इंडिया कहा जाता है। इस सीट पर बंगाली मतदाताओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदी, मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी और बिहारी समुदाय का प्रभाव भी देखने को मिलता है। राजनीतिक दलों की रणनीति में भी गैर-बंगाली वोट बैंक की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक, भवानीपुर में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 2 लाख से 2.06 लाख के बीच है। इनमें लगभग 34 से 40 प्रतिशत मतदाता गैर-बंगाली हिंदू समुदाय से जुड़े बताए जाते हैं।
भाजपा के आंतरिक आंकड़ों के अनुसार अकेले मारवाड़ी मतदाता करीब 10.4 प्रतिशत हैं। इसके अलावा बिहारी, गुजराती और पंजाबी समुदाय के मतदाता भी चुनावी समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि भाजपा ने इस सीट पर हिंदी भाषी और व्यापारिक समुदायों तक पहुंच बढ़ाने के लिए विशेष रणनीति अपनाई। पार्टी नेताओं ने घर-घर संपर्क अभियान, बूथ स्तर के माइक्रो मैनेजमेंट और स्थानीय मुद्दों के जरिए इन वर्गों को साधने की कोशिश की।
माइक्रो-मैनेजमेंट पर रहा पूरा जोर
राजेंद्र राठौड़ के मुताबिक भाजपा ने हर बूथ और शक्ति केंद्र पर अलग रणनीति बनाकर काम किया। पार्टी ने बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क खड़ा किया और मतदाताओं तक सीधा संपर्क बढ़ाया। उन्होंने दावा किया कि टीएमसी को स्थानीय क्लबों और प्रभावशाली समूहों के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की उम्मीद थी, लेकिन भाजपा ने माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए उस पकड़ को कमजोर कर दिया।
मोदी फैक्टर और शुभेंदू अधिकारी की भूमिका
राठौड़ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति लोगों के भरोसे को भी भाजपा की बड़ी ताकत बताया। उनका कहना है कि चुनाव आयोग की सक्रिय भूमिका के कारण मतदाता निडर होकर मतदान केंद्रों तक पहुंचे। उन्होंने शुभेंदू अधिकारी की छवि को भी चुनाव में अहम बताया। राठौड़ के अनुसार अधिकारी की बेबाक और गरीब समर्थक छवि ने मतदाताओं को प्रभावित किया और भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में मदद की।
ममता बनर्जी के आरोपों पर प्रतिक्रिया
ममता बनर्जी द्वारा लगाए गए बूथ कब्जाने और हिंसा के आरोपों पर राठौड़ ने पलटवार करते हुए कहा कि यह हार की निराशा का परिणाम है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पूरी चुनावी प्रक्रिया को संगठनात्मक मजबूती और बूथ प्रबंधन के जरिए संभाला।
सीएम के सवाल पर बोले- राजनीति संभावनाओं का खेल
भवानीपुर से बंगाल के भविष्य का सीएम निकल सकने के सवाल पर राठौड़ ने कहा कि राजनीति संभावनाओं का खेल है और अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा। उन्होंने कहा कि यह जीत एक बड़े नेता के करिश्मे का परिणाम है।
इन नेताओं ने संभाला माइक्रो मैनेजमेंट
पश्चिम बंगाल की चर्चित भवानीपुर सीट पर भाजपा की चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने के लिए राजस्थान से कई नेताओं को जिम्मेदारी दी गई थी। बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और माइक्रो मैनेजमेंट संभालने में इन नेताओं की अहम भूमिका रही।