अच्छी नौकरी, 18 लाख रुपये सालाना पैकेज और सुख-सुविधाओं से भरा जीवन… आमतौर पर युवा इन उपलब्धियों को हासिल करने का सपना देखते हैं। लेकिन राजस्थान के 24 वर्षीय गौरव जैन ने इन सबको पीछे छोड़कर आध्यात्मिक साधना का मार्ग चुना है। आईआईटी दिल्ली से पढ़ाई करने और गुरुग्राम में इंजीनियर के रूप में काम करने वाले गौरव ने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर सांसारिक मोह-माया से दूर रहने का संकल्प लिया। उनके इस निर्णय पर केकड़ी में जैन समाज ने भव्य शोभायात्रा निकालकर अभिनंदन किया।
18 लाख का पैकेज छोड़कर संयम के मार्ग पर चले गौरव
केकड़ी। तपस्या की राह चुनकर वैराग्य का जीवन अंगीकार करने जा रहे 24 वर्षीय गौरव जैन का केकड़ी के सकल दिगंबर जैन समाज ने सोमवार को अभिनंदन किया। इंजीनियर की नौकरी और 18 लाख रुपये सालाना वेतन के साथ घर-परिवार और रिश्ते-नाते त्यागकर आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर अग्रसर इस संयम पथ के राही की शहर में भव्य शोभायात्रा निकाली गई। धर्मसभा में गोद भराई और अन्य सामाजिक रस्मों के जरिए उनका बहुमान किया गया। केकड़ी के अलावा गौरव के पैतृक गांव जूनिया सहित गुलगांव, सावर और मालपुरा आदि जगहों पर भी शोभायात्रा, बिंदौली, गोद भराई और हल्दी रस्म जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
13 साल की उम्र से शुरू हुआ आत्मचिंतन का सफर
तत्त्व के बोध और सत्य की खोज के लक्ष्य ने 24 वर्षीय गौरव जैन के जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने कम उम्र में ही संसार की मोह-माया से दूर होकर संयम का पथ चुन लिया। केकड़ी क्षेत्र के जूनिया गांव निवासी गौरव 13 साल की उम्र से आत्मचिंतन में रुचि लेने लगे थे। कुछ ही दिन पहले, 12 अक्टूबर 2026 को इंदौर में वर्षायोग प्रवास कर रहे प्रख्यात दिगंबर जैन संत निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागरजी महाराज के कर-कमलों से उन्होंने विधिवत ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। इसके बाद उन्होंने घर-परिवार का त्याग कर मुनिसंघ के सानिध्य में रहने का निर्णय किया।
नेमिनाथ मंदिर से निकली शोभायात्रा
सोमवार को केकड़ी शहर में सकल दिगंबर जैन समाज ने आर्यिका सुरम्यमति माताजी के सानिध्य में गौरव की शोभायात्रा और बिंदौली निकाली। जुलूस मार्ग में कई स्थानों पर लोगों ने संयमी गौरव का बहुमान किया। शोभायात्रा बोहरा कॉलोनी स्थित नेमिनाथ मंदिर से रवाना होकर ऋषभदेव जिनालय, आदिनाथ मंदिर, दिगंबर जैन चैत्यालय और पार्श्वनाथ मंदिर होते हुए वापस नेमिनाथ मंदिर पहुंची। इसके बाद धर्मसभा और अभिनंदन समारोह आयोजित हुआ।
समारोह में गौरव के परिवारजनों सहित दिगंबर जैन समाज के सैकड़ों महिला-पुरुषों ने उन्हें शॉल ओढ़ाकर और गोद भराई की रस्म निभाकर सम्मानित किया। इस दौरान मुनि सुधासागरजी के संघ के दो अन्य बाल ब्रह्मचारियों की भी गोद भराई की गई।
2015 में मुनि सुधासागरजी से मिले, तभी बदली जीवन की दिशा
गौरव के चाचा दिलीप जैन और समाज के पारस जैन ने बताया कि जूनिया गांव निवासी गरिमादेवी और राकेश जैन गोयल के ज्येष्ठ पुत्र गौरव ने आईआईटी दिल्ली से उच्च शिक्षा हासिल की। इसके बाद वह गुरुग्राम की एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर के पद पर काम कर रहे थे।
वर्ष 2015 में दिगंबर जैन संत मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने गौरव के ननिहाल केकड़ी के गुलगांव में गुणोदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र की नींव रखी थी। उसी दौरान गौरव ने पहली बार मुनिश्री के दर्शन किए और उनकी साधना से प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मान लिया। वह नियमित रूप से उनके प्रवचन सुनने लगे। प्रवचनों से प्रभावित होकर गौरव संसार की असारता पर चिंतन करने लगे और धीरे-धीरे वैराग्य के मार्ग की ओर बढ़ते गए।
उन्होंने शादी नहीं करने का निर्णय लिया, ब्रह्मचर्य व्रत अंगीकार किया और नौकरी से इस्तीफा दे दिया। परिवार के सदस्यों ने उन्हें रोकने का प्रयास भी किया, लेकिन उनका संकल्प नहीं बदला। नौकरी छोड़ते समय उनका सालाना पैकेज 18 लाख रुपये था।
गुरु ने आसानी से नहीं दिया ब्रह्मचर्य व्रत
आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने वाले गौरव ने बताया कि गुरु ने उन्हें आसानी से व्रत की अनुमति नहीं दी थी। एक बार स्वीकृति नहीं मिलने के कारण उन्हें गुरु की शरण से लौटना भी पड़ा। हालांकि, वैराग्य की प्रबल भावना को देखते हुए मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ने 12 अक्टूबर 2026 को इंदौर में उन्हें ब्रह्मचर्य व्रत धारण कराया।
गौरव के अनुसार, दुर्लभ मानव जीवन में पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण उन्हें संयम पथ पर आगे बढ़ने का अवसर मिला है। इसे वह अपना परम सौभाग्य और गर्व का क्षण मानते हैं। उन्होंने बताया कि गुरु की आज्ञा लेकर वह अपनी जन्मभूमि जूनिया और केकड़ी आए हैं।
‘संसार असार है, खारा है’, संयम से ही मोक्ष का मार्ग
सोमवार को आयोजित अभिनंदन समारोह में गौरव जैन ने कहा कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए संयम जरूरी है। संयम के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। उन्होंने दिवंगत संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागरजी महाराज की पंक्तियों के साथ अपना उद्बोधन शुरू किया- ‘उस पथिक की क्या परीक्षा, पथ में शूल न हो। उस नाविक की क्या परीक्षा, धारा प्रतिकूल न हो।’
गौरव ने कहा कि संसार असार है और संयम के मार्ग पर चलकर ही सांसारिक मोह-माया से छुटकारा पाया जा सकता है। उनके मुताबिक, भौतिकता की चकाचौंध के बीच अध्यात्म और वीतराग मार्ग की ओर बढ़ना उनके लिए बड़ी उपलब्धि है।
परिवार को दिया श्रेय
गौरव ने अपने गुरु मुनिपुंगव श्री सुधासागरजी महाराज की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके जैसे गुरु मिलना दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि गुरु की देशना से युवा पीढ़ी में संस्कारों का बीजारोपण हो रहा है।
गौरव ने बचपन से अब तक की स्मृतियां साझा कीं और अपने दादा-दादी, माता-पिता तथा पूरे गोयल परिवार के प्रति आभार जताया। उन्होंने कहा कि परिवार की परवरिश के कारण ही वह जीवन के श्रेष्ठ मार्ग पर आगे बढ़ सके हैं। जब उन्होंने कहा कि वह अपने माता-पिता के लिए कुछ नहीं कर सके, तो सभा में मौजूद लोग भावुक हो गए। उन्होंने अपने शिक्षकों और मित्रों का भी आभार व्यक्त किया।
परिवार में और भी लोगों ने अपनाया है वैराग्य
गौरव का परिवार धार्मिक आस्था, तप, त्याग और संयम से जुड़ा रहा है। गौरव जूनिया गांव के जैन गोयल (लावरिया) परिवार के तीसरे सदस्य हैं, जिन्होंने दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार वैराग्य का मार्ग अपनाया है। इससे पहले उनकी दो बुआ अंजू और रेशु भी संयम के व्रत धारण कर चुकी हैं।