जेएलएफ में बोले फिल्म समीक्षक अजीत राय।
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फिल्म समीक्षक अजीत राय ने कहा-अगर शाहरुख मुसलमान नहीं होते, तो शायद यह विरोध भी नहीं होता। यह एक तरीके का मेन्युफैक्चरर प्रोटेस्ट है, इसलिए मैं इसका समर्थन नहीं करता हूं। उन्होंने कहा- व्यक्तिगत तौर पर मैं फिल्म क्रिटिक के रूप में फिल्म सेंसरशिप या किसी तरह की सेंसरशिप को नहीं मानता हूं। उन्होंने कहा- दुनियाभर में क्रिएटिव सेंसरशिप कहीं पर भी नहीं है।
बॉलीवुड फिल्मों का 5000 करोड़, जूतों का बाजार 56 हजार करोड़ का है
अजीत राय बोले- बॉलीवुड में कोई क्रिएटिव माइंडसेट डवलप नहीं हो पा रहा है। इसी कारण से बॉलीवुड दुनिया में पिछड़ रहा है। इंडिया में सबसे कम पैसा राइटिंग और क्रिएटिव माइंडसेट पर खर्च होता है। वर्ल्ड लेवल पर फिल्म बिजनेस पर नज़र डालें, तो यूरोप के मुकाबले हमारी जीडीपी 0.5 प्रतिशत ही है। पूरी बॉलीवुड फ़िल्म इंडस्ट्री केवल 5 हजार करोड़ रुपए की है। जबकि टीवी और न्यूज इंडस्ट्री इससे कहीं बड़ी है। टीवी का मार्केट करीब 80 हजार करोड़ रुपए से ऊपर का है। हमारी बॉलीवुड फिल्मों से ज्यादा का तो शूज का मार्केट है, जो करीब 56 हजार करोड़ का है।
हॉलीवुड की एक ही फिल्म पूरी बॉलीवुड इंडस्ट्री के बराबर
अजीत राय ने कहा- बॉलीवुड में सलेक्शन सबसे बड़ी समस्या है। क्योंकि इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। पहले के ज़माने में
हमारी इंडस्ट्री की फिल्में पूरे वर्ल्ड में दिखाई जाती थीं। 'संगम' जैसी फिल्में कई देशों में 3-3 साल तक सिनेमाघरों में दिखाई गईं। लेकिन बॉलीवुड के ऐसे हाल नहीं है। हॉलीवुड में कोई फिल्म 2000 करोड़ रुपए में बनती है, तो 5000 करोड़ रुपए तक कमा लेती है। हॉलीवुड की एक ही फिल्म हमारी पूरी बॉलीवुड इंडस्ट्री के बराबर है।