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धौलपुर: चंबल में डॉल्फिन की संख्या का होगा सटीक आकलन, देहरादून के विशेषज्ञों ने वनकर्मियों को दिया प्रशिक्षण

Sun, 18 Oct 2026 05:35 PM IST
धौलपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धौलपुर

सार

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में रिवर डॉल्फिन की गणना आधुनिक तकनीक से शुरू हुई है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के वन विभागों के साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञ सर्वेक्षण कर रहे हैं। फरवरी 2026 में 155 डॉल्फिन दर्ज हुई थीं।

 

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रिवर डॉल्फिन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में विलुप्तप्राय जलीय जीव रिवर डॉल्फिन की गणना आधुनिक तकनीक के माध्यम से शुरू कर दी गई है। इस अभियान में राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के वन विभागों के कर्मचारियों के साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के विशेषज्ञों की टीम भी भाग ले रही है। डॉल्फिन की वास्तविक संख्या का पता लगाने और उनके प्राकृतिक आवास को बेहतर ढंग से समझने के उद्देश्य से शुरू किया गया यह सर्वेक्षण जलीय जीवों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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गणना अभियान में वन विभाग के कर्मचारियों के साथ वन्यजीव विशेषज्ञ और प्रशिक्षित सदस्य शामिल हैं। अभियान से पहले चंबल नदी के तटवर्ती राज्यों के वनकर्मियों को देवरी घड़ियाल केंद्र पर वन्यजीव संस्थान, देहरादून के प्रशिक्षकों ने एक दिवसीय प्रशिक्षण दिया। इसके तहत गणना की आधुनिक तकनीकों, जलीय जीवों की पहचान और सर्वेक्षण के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं की जानकारी दी गई।

चंबल में फरवरी की गणना में मिली थीं 155 डॉल्फिन
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य क्षेत्र में फरवरी 2026 में हुई जलीय जीवों की गणना के दौरान चंबल नदी के 435 किलोमीटर लंबे प्रतिबंधित क्षेत्र में 155 रिवर डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। अब आधुनिक तकनीक से दोबारा गणना किए जाने से इनकी संख्या, वितरण और प्राकृतिक आवास से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है।
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गणना दल चंबल नदी में सर्वेक्षण करते हुए राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के अंतिम छोर उत्तरप्रदेश के इटावा स्थित पचनदा तक पहुंचेगा। अभियान के तहत 15 अक्टूबर तक इस क्षेत्र में गणना पूरी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस सर्वेक्षण में स्थानीय वनकर्मियों की भूमिका भी अहम रहेगी, जो अपने-अपने क्षेत्र में गणना दल के साथ मौजूद रहकर सहयोग करेंगे।

देश की प्रमुख नदियों में डॉल्फिन की गणना का दूसरा चरण
देश में रिवर डॉल्फिन की गणना का पहला चरण वर्ष 2021 से 2024 के बीच पूरा किया गया था। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस चरण में कुल 6,227 डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। इनमें 6,224 गंगा डॉल्फिन और तीन सिंधु डॉल्फिन शामिल थीं। सिंधु डॉल्फिन पंजाब की ब्यास नदी में पाई गई थीं।

गणना के दूसरे चरण की शुरुआत जनवरी 2026 में हुई। इसके तहत उत्तरप्रदेश के बिजनौर से गंगासागर तक गंगा नदी के लगभग 2,400 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में सर्वेक्षण किया जा चुका है। अब राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के अंतर्गत चंबल नदी और ब्रह्मपुत्र नदी में आधुनिक तकनीक के माध्यम से डॉल्फिन की गणना की जा रही है।

इस अभियान का उद्देश्य केवल डॉल्फिन की संख्या का पता लगाना ही नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास, वितरण और संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों को समझना भी है। इससे भविष्य में इनके संरक्षण के लिए प्रभावी योजनाएं तैयार करने में मदद मिल सकती है।

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वनकर्मियों को दिया जा रहा तकनीकी प्रशिक्षण
डॉल्फिन की गणना को अधिक सटीक और वैज्ञानिक बनाने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून की ओर से शोधार्थियों, वनकर्मियों, स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं और जलीय जीव विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया गया है। प्रशिक्षित विशेषज्ञ नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में कार्यरत वन विभाग के कर्मचारियों को गणना की तकनीक से अवगत करा रहे हैं।

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य क्षेत्र के 50 से अधिक वनकर्मियों को भी प्रशिक्षण दिया जा चुका है। गणना अभियान के दौरान ये कर्मचारी अपने निर्धारित क्षेत्रों में सर्वेक्षण दल के साथ रहेंगे और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक सहयोग प्रदान करेंगे।

आधुनिक तकनीक और प्रशिक्षित कर्मचारियों की भागीदारी से गणना के आंकड़ों की विश्वसनीयता बढ़ने की उम्मीद है। इसके साथ ही वनकर्मियों को जलीय जीवों की पहचान, उनके व्यवहार और संरक्षण से संबंधित विषयों की गहन जानकारी भी मिल रही है।

डॉल्फिन संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा सर्वेक्षण
गंगा डॉल्फिन को स्थानीय भाषा में सूंस भी कहा जाता है। नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। नदियों में प्रदूषण, प्राकृतिक आवास में बदलाव और मानवीय गतिविधियों जैसी चुनौतियां जलीय जीवों के संरक्षण को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में नियमित और वैज्ञानिक गणना के माध्यम से इन जीवों की स्थिति का आकलन करना जरूरी है।

राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में शुरू किया गया यह अभियान डॉल्फिन की संख्या का अधिक सटीक आकलन करने के साथ उनके संरक्षण की भावी रणनीति तैयार करने में भी उपयोगी साबित हो सकता है। अभियान में शामिल वनकर्मी भी इसे लेकर उत्साहित हैं। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से गणना करने से जलीय जीवों के बारे में उनकी समझ बढ़ेगी और वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
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चंबल में जलीय जीवों का बढ़ रहा कुनबा 
चंबल नदी देश की सबसे साफ सुथरी मानी जाती है। जलीय जीवों का माहौल चंबल में सबसे अनुकूल माना जाता है। चंबल में घड़ियाल मगरमच्छ डॉल्फिन एवं नाना प्रकार के कछुआ की प्रजाति पाई जाती है। देवरी घड़ियाल केंद्र के अनुसार चंबल में मौजूदा समय में करीब 3000 घड़ियाल हैं। इसके अलावा करीब डेढ़ हजार मगरमच्छ के साथ सैकड़ो की तादात में कछुए पाए जाते हैं। चंबल नदी पर सैकड़ो प्रजाति के पक्षी मेहमान भी प्रजनन करने पहुंचते हैं।
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