सचिन पायलट और उनके समर्थक मंत्री एवं विधायकों ने पिछले 48 घंटे में दो बार पार्टी व्हिप और दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया है। इसे पार्टी विरोधी गतिविधियों का आधार देकर कांग्रेस पार्टी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए सचिन पायलट को सभी पदों से हटा दिया है।
सचिन पायलट का उपमुख्यमंत्री और राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष पद और मंत्रिमंडल के विभागों से हटाया जाना अब उनके लिए उनकी ही पार्टी की खुली चुनौती है। पार्टी की तरफ से हुई कार्रवाई से तीन चीजें साफ हैं।
पहला, कांग्रेस हाईकमान अवहेलना और अनुशासनहीनता के चलते मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ दृढ़ता से खड़ा है। दूसरा, सचिन पायलट की जिद और अकड़ के आगे झुकने के दरवाजे बंद हो चुके हैं।
सचिन पायलट से पहले अहमद पटेल की बात हुई। कहा जा सकता है कि अहमद पटेल से 15 से अधिक बार बात हो चुकी है। राहुल गांधी की बात हुई, केसी वेणुगोपाल ने उन्हें समझाने का प्रयास किया और पी चिदंबरम ने भी बात की।
वरिष्ठ नेताओं के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय माकन, वरिष्ठ नेता अविनाश पांडे ने भी कोशिश की। सचिन पायलट की तरफ से भंवरलाल शर्मा फोन उठाते रहे। अंत में प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी कोशिश की।
प्रियंका ने ही 2018 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मिलकर सचिन पायलट और अशोक गहलोत में समझौता कराया था। प्रियंका के ओएसडी रहे धीरज श्रीवास्तव भी आजकल राजस्थान सरकार के साथ ही हैं।
इस समझौते और पायलट को मनाने में जतिन प्रसाद जैसे युवा नेताओं को भी अजमाने का प्रयास हुआ। हालांकि जतिन ने खुद को पीछे खींच लिया। सूचना है कि जतिन समेत कुछ नेताओं से सचिन की बात भी हुई।
कुल मिला कर यही निकल कर सामने आ रहा है कि सचिन पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ काम नहीं करना चाहते। वह जो शर्तें थोप रहे हैं, वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मंजूर नहीं है।
कांग्रेस पार्टी के एक महासचिव ने कहा कि सचिन पायलट कांग्रेस के नेता हैं। उनकी कोई भी शिकायत है, तो वह पार्टी के फोरम पर रखें। यह आंतरिक मामला है और इसका समाधान इसी तरह से होता है।
उनसे पार्टी के वरिष्ठ नेता भी लगातार बात कर रहे हैं, लेकिन पायलट ने जिद पकड़ ली है। वह भाजपा के नेताओं (सिंधिया) के संपर्क में हैं। उनसे बातचीत कर रहे हैं और अपनी ही पार्टी के नेताओं से बात करने से कतरा रहे हैं।
आखिर उनकी इस पार्टी विरोधी गतिविधि को कैसे सहन किया जा सकता है? एक अन्य वरिष्ठ नेता पीएल पूनिया तो मानकर बैठ गए हैं कि सचिन पायलट अब सिंधिया की राह पर हैं।
पार्टी के एक अन्य नेता ने बताया कि अब तो कार्रवाई शुरू हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने अपने नेताओं के खिलाफ निर्णय लेना शुरू कर दिया है। इसका अर्थ साफ है कि सचिन पायलट भी अपना रास्ता खुद तय कर लें।
सूत्र का कहना है कि यह अपने नाराज नेता के लिए आप आखिरी अवसर भी मान सकते हैं। सुबह का भूला शाम को लौट आए तो भूला नहीं कहते। लेकिन अब निर्णय सचिन पायलट को ही लेना है।
अशोक गहलोत ने सोमवार और मंगलवार को हुई विधायकों की बैठक में अपना दम दिखाया है। सचिन पायलट के साथ अभी 20 से कम विधायक हैं। पायलट खेमे का दावा है कि 10-12 विधायक और साथ हैं।
अशोक गहलोत के पास बहुमत नहीं है और सदन में परीक्षण के दौरान यह साबित हो जाएगा। दरअसल राजस्थान में भाजपा के पास अभी 76 विधायक हैं। 76 विधायकों में 45 पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थक हैं।
वसुंधरा राजे राज्य की स्थापित भाजपा नेता हैं। इसलिए अभी तमाम समीकरणों को देखते हुए नहीं कहा जा सकता कि सचिन पायलट आगे की राजनीति में कोई बड़ा खुल खिला पाएंगे।
अशोक गहलोत के मार्गदर्शन में हाल में संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी को 123 मत मिले थे। बहुमत के लिए 200 सदस्यीय विधानसभा में 101 की जरूरत है।
कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि यदि सचिन का विधायकों के साथ बागी रुख बना रहता है, तब भी उन्हें नुकसान नहीं है। क्योंकि सचिन समेत सभी की सदस्यता भी जाएगी। विधानसभा की संख्या घटेगी तो बहुमत का आंकड़ा भी घटेगा।