भरतपुर। केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान (घना) से अफ्रीकी तकनीक ''बोमा'' के जरिए मुकुंदरा व रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में चीतलों को शिफ्ट किया जा रहा है। अब तक घना से 500 चीतलों को शिफ्ट किया जा चुका है। जबकि अभी 300 चीतल और शिफ्ट किए जाने हैं। चीतलों की इसशिफ्टिंग में अफ्रीकी तकनीक ''बोमा'' का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे अभी तक एक भी चीतल को हानि नहीं पहुंची है।
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक मानस सिंह ने बताया कि उद्यान से अब तक 500 चीतल टाइगर रिजर्व में शिफ्ट किए जा चुके हैं। इनमें 350 चीतल मुकुंदरा टाइगर रिजर्व और 150 चीतल रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में भेजे जा चुके हैं। घना प्रशासन लगातार चीतलों की शिफ्टिंग में जुटा हुआ है। करीब 10 दिन के दौरान 170 चीतलों की शिफ्टिंग की गई है। निदेशक ने बताया कि घना से कुल 800 चीतलों को तीन टाइगर रिजर्व में शिफ्ट किया जाना है। इनमें मुकुंदरा में 350, रामगढ़ विषधारी में 150 और कैलादेवी टाइगर रिजर्व में 150 चीतल शिफ्ट किए जाने हैं। इसके लिए घना के कर्मचारियों को अफ्रीकी बोमा तकनीक का विशेष प्रशिक्षण दिलाया गया था।
यह है बोमा तकनीक
निदेशक मानस सिंह ने बताया कि चीतल बहुत ही संवेदनशील वन्यजीव है। इसको जबरन पकड़कर शिफ्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए इसके लिए अफ्रीकी बोमा तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसके तहत घना के अंदर झाड़ियों से ढककर पेड़ों के बीच और जलाशयों के पास बाड़े तैयार किए गए हैं। इनमें चीतलों के लिए चारे की व्यवस्था की गई है। धीरे-धीरे चीतल इनमें आते रहते हैं। आखिरी बाड़े में एक छोटा दरवाजा बनाया गया है। इस पर रात को पिंजरे वाले ट्रक खड़ा कर दिया जाता है। ट्रक के अंदर भी चारा और झाड़ियां लगाई जाती हैं। इससे चीतल उसमें चढ़ जाते हैं और उनकी आसानी से शिफ्टिंग कर दी जाती है।