राजस्थान के बाड़मेर जिले में पंचायती राज चुनाव से पहले कांग्रेस ने आपसी मतभेद दूर कर संगठन को मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। शिव विधानसभा क्षेत्र में पूर्व मंत्री अमीन खान और कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष फतेह खान करीब तीन साल की दूरी के बाद अब एक मंच पर नजर आ रहे हैं। रामसर और बिजराड़ सहित कई क्षेत्रों में दोनों नेताओं को सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल के साथ एक ही वाहन में यात्रा करते और चुनावी गतिविधियों में हिस्सा लेते देखा गया है। नगर निकाय चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के लिए पंचायत चुनाव में एकजुट होकर उतरना अहम माना जा रहा है।
कांग्रेस में प्रत्याशी चयन पर मंथन, गुटबाजी खत्म करने की कोशिश
कांग्रेस विधानसभा और उपखंड स्तर पर लगातार बैठकें कर रही है। पार्टी कार्यकर्ता जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य के टिकट के लिए दावेदारों से आवेदन ले रहे हैं। शिव विधानसभा क्षेत्र में तीन साल पहले विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट नहीं मिलने पर फतेह खान ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा था। इसके बाद अमीन खान और फतेह खान के बीच मतभेद गहरा गए थे। अब दोनों नेताओं के साथ आने से कांग्रेस संगठन को मजबूती मिलने और पुराने मतभेद दूर होने की उम्मीद जताई जा रही है। पार्टी जमीनी स्तर से मिले फीडबैक के आधार पर योग्य प्रत्याशियों के चयन पर ध्यान दे रही है। कांग्रेस की कोशिश है कि चुनाव में गुटबाजी का असर कम हो और जिला परिषद तथा पंचायत समिति की सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारे जा सकें।
भाजपा की नजर जिला प्रमुख की कुर्सी पर
भारतीय जनता पार्टी भी बाड़मेर जिले में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। पार्टी इस बार जिले में पहली बार अपना जिला प्रमुख बनाने के लक्ष्य के साथ चुनावी तैयारी कर रही है। भाजपा की ओर से नियुक्त प्रभारी अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों और पंचायत समितियों में कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं।
भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष स्वरूपसिंह खारा भी मंडलवार पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से चर्चा कर रहे हैं। कई सीटों पर दो से पांच दावेदारों ने टिकट के लिए आवेदन किया है। पार्टी वार्डवार पैनल तैयार कर रही है और संभावित प्रत्याशियों की जीत की संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है।
आरएलपी की एंट्री से कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) की चुनाव में सीधी भागीदारी से जिला परिषद और पंचायत समिति की कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना जताई जा रही है। आरएलपी के मैदान में उतरने से स्थानीय जातीय और सामाजिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। भाजपा के सामने अपने पारंपरिक वोट बैंक को एकजुट रखने और निर्दलीय प्रत्याशियों की चुनौती से निपटने का दबाव रहेगा। वहीं, कांग्रेस आपसी मतभेद दूर कर संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की कोशिश कर रही है। तीनों प्रमुख दल सर्वे और कार्यकर्ताओं से मिले फीडबैक के आधार पर प्रत्याशियों के नाम तय करने में जुटे हैं। अब देखना होगा कि टिकट वितरण और चुनावी रणनीति के दौरान दल स्थानीय समीकरणों को किस तरह साधते हैं।