इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक बीरबल मीणा हैं, उन्होंने बताया कि इस गांव में उर्दू भरण पोषण की भाषा बन गई है इसलिए गावं इस भाषा को किसी संप्रदाय के नजर से नहीं देखता है।
इस विषय पर गांव के लोगों का कहना है कि उर्दू किसी संप्रदाय या देश की भाषा नहीं लगती है। ये बेहद प्यारी भाषा है और हमें रोजगार के अवसर भी दे रही है। गांव वालों ने बताया कि पहले उर्दू की अनुसूचित जनजाति की सीटें खाली रह जाती थी लेकिन अब ये गांव अकेले इन सीटों को भरने लगा है।
छठी कक्षा से उर्दू पढ़ाई की हो व्यवस्था
गांव के ही रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि हम सरकार से मांग कर रहे है कि इस विद्यालय में छठी कक्षा से उर्दू की पढ़ाई की व्यवस्था की जाए क्योंकि सरकार के पास नियम नहीं है कि किसी हिंदू बहुल इलाके में प्राथमिक विद्यालय में उर्दू के टीचर रखे जाएं। हम सरकार से लगातार इस नियम को बदलने की मांग कर रहे हैं।
गांव में अभी तक 100 से ज्यादा लोगों की मेडिकल, भाषा, शिक्षा और समाज कल्याण विभाग में नौकरी लगी है। दूर-दराज इस गांव में बेरोजगारी की समस्या से निपटने के लिए यह बेहतरीन रामबाण निकाला है जिसके इस गांव की पूरी तस्वीर ही बदल गई है।
ऐसे शुरू हुआ गांव का उर्दू से लगाव
छह साल पहले गांव के एक शख्स की नजर सरकारी नौकरी की भर्ती पर गई। जहां उसने देखा कि उर्दू जानने वाले नौकरियों में अनुसूचित जनजाति के लोगों की सीटें खाली रह जा रही है। जिसके बाद वह शहर गया और उर्दू सीख कर लेक्चरार की नौकरी हासिल की। उसके बाद पूरे गांव के लोगों ने बेरोजगारी से निपटने के लिए इस तरीके को अपनाना शुरू कर दिया।