जैन समाज की पुरानी परम्परा संथारा एक बार फिर से चर्चा में है। अजमेर के किशनगढ़ तहसील की शिवाजी कॉलोनी में रहने वाले 86 वर्षीय बुजुर्ग बंशीलाल कोटेचा ने संथारा ले लिया है। वे सात दिन से अन्न जल त्याग चुके हैं। उनके संबंधी प्रेमचंद कोटेचा ने बताया कि उसके चाचा बंशीलाल कोटेचा पिछले लम्बे समय से बीमारी से ग्रसित चल रहे हैं। उनके पेट में कैंसर की गांठ होने से वह पिछले डेढ माह से कुछ खा पी नहीं रहे थे। इसके चलते सात दिन पूर्व मुनि प्रमाण सागर की प्रेरणा और महाराज सा ज्ञानलाता के सान्निध्य में संथारा ले लिया।
प्रेमचंद कोटेचा ने बताया कि उनका परिवार बीड़ी का व्यापार से जुड़ा है। उनके चाचा के चार बेटे, तीन बेटियां और पांच पोते हैं। पूरा परिवार संथारा लेने के बाद उनके पास ही है। प्रेमचंद कोटेचा ने बताया कि चाचा के अतिम सांस लेने के बाद उनकी बैकुंठी निकाली जाएगी। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संथारा लेने के पीछे मुख्य उद्देश्य आत्मा का पवित्र करना है। समाज के महाराज भी अंतिम समय में संथारा लेकर ही प्राण त्यागते हैं।
संथारा जैन धर्म में सबसे पुरानी प्रथा मानी जाती है। इसे संल्लेखना भी कहते हैं। जैन समाज में इस तरह से देह त्यागने को बहुत पवित्र कार्य माना जाता है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी मृत्यु निकट है, तो वह खुद को एक कमरे में बंद कर खाना-पीना त्याग देता है।