राजनीतिक हलकों में पहले से ही यह चर्चा थी कि पार्टी बदलने के बाद गुप्ता के औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर सरकारी एजेंसियों की नजरें टेढ़ी हो सकती हैं। पीपीसीबी की इस ताजा कार्रवाई को भी उसी कड़ी में देखा जा रहा है। हालांकि, आधिकारिक स्तर पर इसे नियमित निरीक्षण बताया जा सकता है लेकिन समय और परिस्थितियां इसे राजनीतिक रंग दे रही हैं।
दूसरी ओर, स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्राईडेंट यूनिट के खिलाफ लंबे समय से जल और वायु प्रदूषण की शिकायतें की जा रही थीं। ग्रामीणों का आरोप है कि फैक्टरी से निकलने वाले अपशिष्ट और धुएं के कारण आसपास के क्षेत्र में पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। उनका यह भी कहना है कि उद्योगपति की राजनीतिक पहुंच के कारण अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। उद्योग जगत के जानकार इस घटनाक्रम को दो नजरियों से देख रहे हैं। एक ओर इसे पर्यावरण नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे राजनीतिक दबाव की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है।
अब सबकी नजरें पीपीसीबी की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह साफ हो सकेगा कि कार्रवाई महज औपचारिक थी या वास्तव में पर्यावरणीय उल्लंघनों के ठोस सबूत सामने आए हैं। फिलहाल ट्राइडेंट पर हुई इस रेड ने पंजाब की सियासत में नए सवाल खड़े कर दिए हैं और उद्योग-राजनीति के रिश्तों पर बहस को फिर से तेज कर दिया है।