पंजाबी सूबा अभियान में शामिल लोगों को एक हजार रुपये प्रतिमाह पेंशन की योजना पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकार के इस ऐलान को पूरी तरह सियासी कदम करार देते हुए एक जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह अभियान राजनीति का हिस्सा था। ऐसे में इसमें शामिल लोग कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं हो सकते, जिन्हें पेंशन दी जानी चाहिए।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस एसएस सारों और गुरमीत राम की डिवीजन बेंच ने याचिका पर नोटिस जारी कर पंजाब सरकार से जवाब मांगा है। सुनवाई चार अप्रैल को होगी। एडवोकेट एचसी अरोड़ा ने याचिका में कहा है कि सरकार की यह पेंशन योजना जनहित से जुड़ी नहीं है। बल्कि यह स्कीम पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है।
आरोप है कि पेंशन देकर सूबे की सत्ताधारी अकाली सरकार अपने कार्यकर्ताओं को ही सरकारी खजाने से फायदा पहुंचाने की फिराक में है। ऐलान किया है कि पंजाबी सूबे की मांग के अभियान में जिन लोगों ने भाग लिया, सरकार उन्हें सरकार सम्मान पत्र देगी।
ऐसे लोगों को गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर विशेष तौर पर आमंत्रित किया जाएगा। साथ ही प्रतिमाह एक हजार की वित्तीय मदद दी जाएगी। कहा है कि इस पैसे से सत्ताधारी पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को पेंशन देने जा रही है। याचिका में कहा गया है कि इस योजना को बंद करने के लिए मुख्य सचिव पंजाब को कानूनी नोटिस भी भेजा गया था, लेकिन नोटिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।