शिअद लौंगोवाल और शिअद बादल तेरह साल बाद एक हो गए। पार्टी में शामिल होने पर बरनाला परिवार का स्वागत करने के लिए शिअद अध्यक्ष सुखबीर बादल खुद आए और पार्टी नेताओं को गले लगाया। सुखबीर ने लौंगोवाल दल की अध्यक्ष बीबी सुरजीत कौर बरनाला, उनके बेटे पूर्व विधायक गगनजीत सिंह बरनाला, पोते सिमरप्रताप सिंह बरनाला, पूर्व मंत्री बलदेव सिंह मान समेत अन्य नेताओं का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि बरनाला परिवार के पार्टी में आने से पार्टी को मजबूती मिलेगी।
2004 में अकाली दल में मालवा के दिग्गज नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला और अकाली दल के महासचिव सुखदेव सिंह ढींढसा के बीच सियासी खींचतान के चलते बरनाला परिवार ने खुद को पार्टी से अलग करके शिरोमणि अकाली दल लौंगोवाल पार्टी बना ली थी।
उस समय सुरजीत सिंह बरनाला राज्यपाल थे और सियासी गतिविधियों से दूर थे। उनकी पत्नी सुरजीत कौर बरनाला ने पार्टी की अध्यक्ष बनकर सारी कमान अपने हाथों में ले ली थी। शहीद हरचंद सिंह लौंगोवाल के नाम पर बनी इस पार्टी को पंजाब के लोग तीसरे बदलाव के रूप में देखने लगे थे।
2007 में पार्टी ने फिर अकाली दल में शामिल होने का फैसला किया लेकिन इसके बाद भी ढींढसा और बरनाला परिवारों में सियासी कशमकश जारी रही और दोनों के रास्ते एक न हो पाए।
2012 के विधानसभा चुनाव में लौंगोवाल दल ने मनप्रीत बादल की अगुवाई वाली पार्टी पीपीपी के साथ गठबंधन किया। धूरी और संगरूर से दोनों पार्टियों ने संयुक्त तौर पर चुनाव भी लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। संगरूर से पार्टी प्रत्याशी बलदेव सिंह मान और धूरी से गगनजीत सिंह बरनाला तीसरे स्थान पर रहे।
2015 में धूरी के उप चुनाव में लौंगोवाल दल ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और सिमरप्रताप सिंह बरनाला को कांग्रेस ने अपने चुनाव निशान पर मैदान में उतारा। सिमर अकाली दल के गोबिंद सिंह लौंगोवाल से तीस हजार से अधिक वोट के फर्क से हार गए थे।
शिरोमणि अकाली दल लौंगोवाल ने विधानसभा चुनाव से पहले 2016 में समूची पार्टी को कांग्रेस में मर्ज करवा दिया लेकिन कांग्रेस द्वारा घोषित उम्मीदवारों की सूची में बरनाला गुट के एक भी सदस्य का नाम न आने पर बरनाला गुट में निराशा फैल गई थी।
पार्टी एक बार फिर अकाली दल बादल में शामिल हो गई। इस दौरान पार्टी के महासचिव सुखदेव सिंह ढींढसा ने भी बरनाला परिवार का स्वागत किया। इस मौके पर संगरूर से विधायक प्रकाश चंद गर्ग, दिड़बा से प्रत्याशी गुलजार सिंह, धूरी से हरी सिंह और गोबिंद सिंह लौंगोवाल मौजूद थे।