पराली न जलाने के लिए किसानों को जागरूक करने से लेकर जुर्माना लगाने, एफआईआर दर्ज करने और खेतों की निगरानी के लिए हजारों अधिकारियों की तैनाती तक, पंजाब सरकार ने इस बार पूरा जोर लगा रखा है। खेतों में आग पर नजर रखने के लिए 125 ड्रोन तैनात करने की तैयारी है। पराली प्रबंधन के लिए मशीनों पर सब्सिडी दी जा रही है और गांव-गांव किसानों को फसल अवशेष न जलाने के लिए समझाया जा रहा है। इसके बावजूद खेतों में आग लगने का सिलसिला थम नहीं रहा।
सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई तरनतारन के कच्चा पक्का और भैणी मंसा सिंह जैसे गांवों में साफ दिखाई देती है, जहां दोपहर दो बजे भी खेतों में पराली खुलेआम जलाई जा रही है। धुएं के गुबार आसपास के गांवों और मुख्य सड़कों तक फैल रहे हैं। इससे हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के साथ सड़क हादसों का खतरा भी बढ़ रहा है।
आंकड़े भी सरकारी प्रयासों के पूरी तरह कारगर न होने की गवाही दे रहे हैं। पंजाब में 15 सितंबर से 17 अक्तूबर तक पराली जलाने की 220 सक्रिय घटनाएं दर्ज की गईं। पिछले साल इसी अवधि में 208 घटनाएं सामने आई थीं। यानी इस बार पिछले साल के मुकाबले 12 मामले ज्यादा हैं। हालांकि, 2024 में इसी अवधि के दौरान 1289 घटनाएं दर्ज की गई थीं। उस लिहाज से मौजूदा स्थिति में काफी सुधार है, लेकिन पिछले साल की तुलना में बढ़ोतरी बताती है कि पराली जलाने पर पूरी तरह अंकुश लगाने की चुनौती अब भी कायम है।
पराली जलाने की घटनाओं में तरनतारन और अमृतसर सबसे बड़े हॉटस्पॉट बनकर उभरे हैं। 17 अक्तूबर तक राज्य में दर्ज 220 घटनाओं में से तरनतारन में 95 और अमृतसर में 81 मामले सामने आए। दोनों जिलों को मिलाकर यह संख्या 176 होती है, जो राज्य की कुल घटनाओं का करीब 80 फीसदी है। यानी पराली जलाने पर नियंत्रण की लड़ाई में सबसे बड़ी चुनौती इन्हीं दो जिलों में है।
पंजाब में पराली जलाने की 29 सक्रिय घटनाएं दर्ज
17 अक्तूबर को ही पंजाब में पराली जलाने की 29 सक्रिय घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि पिछले साल इसी तारीख को 20 और 2024 में 77 मामले सामने आए थे। एक दिन में पिछले साल के मुकाबले नौ अधिक घटनाएं दर्ज होना बताता है कि कटाई के इस दौर में आग की घटनाओं को रोकना आसान नहीं है। उस दिन तरनतारन में 23, अमृतसर में तीन और फिरोजपुर, लुधियाना व एसएएस नगर में एक-एक सक्रिय घटना दर्ज की गई।
अन्य जिलों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। 15 सितंबर से 17 अक्तूबर तक फिरोजपुर में 10, गुरदासपुर और मुक्तसर में पांच-पांच, जालंधर, कपूरथला, मोगा और संगरूर में तीन-तीन घटनाएं दर्ज हुईं। फाजिल्का में दो, जबकि होशियारपुर, लुधियाना, एसबीएस नगर, एसएएस नगर और फरीदकोट में एक-एक घटना सामने आई। बठिंडा, बरनाला, फतेहगढ़ साहिब, मानसा, पठानकोट, पटियाला, रूपनगर और मलेरकोटला में इस अवधि में कोई घटना दर्ज नहीं हुई।
कागजों पर कार्रवाई, वसूली में पिछड़ रहा तंत्र
सरकार ने पराली जलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए जुर्माने से लेकर कानूनी कदम उठाने तक के प्रावधान लागू किए हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 220 घटनाओं में से 191 स्थानों का निरीक्षण किया गया। इनमें 68 स्थानों पर खेतों में पराली जलाए जाने की पुष्टि हुई। 65 मामलों में पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया और कुल 3.35 लाख रुपये का जुर्माना निर्धारित किया गया। लेकिन इसमें से अब तक केवल 1.45 लाख रुपये ही वसूले जा सके हैं। यानी निर्धारित जुर्माने का करीब 43 फीसदी हिस्सा ही सरकारी खजाने में पहुंचा है।
कार्रवाई के तहत 19 मामलों में भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत एफआईआर दर्ज की गई और 41 मामलों में खेतों के राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री की गई। इसके अलावा संबंधित अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के लिए 94 चेतावनी या कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। हालांकि, रिपोर्ट में सीएक्यूएम अधिनियम की धारा 14 के तहत अभियोजन, चार्जशीट और निलंबन की कार्रवाई की संख्या शून्य दर्ज है। ऐसे में सवाल यह है कि खेतों में आग रोकने की जिम्मेदारी संभाल रहे अधिकारियों के खिलाफ नोटिस जारी करने के बाद जवाबदेही किस स्तर तक तय हो रही है।
तरनतारन में 72 स्थानों का निरीक्षण किया गया, जिनमें 25 जगहों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई। यहां 1.35 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसमें से 60 हजार रुपये की वसूली हुई। जिले में 12 एफआईआर दर्ज की गईं और 25 मामलों में रेड एंट्री की गई। अमृतसर में 81 घटनाओं के मुकाबले 78 स्थानों का निरीक्षण हुआ और 28 जगहों पर पराली जलाने की पुष्टि की गई। यहां 1.30 लाख रुपये का जुर्माना निर्धारित हुआ, जिसमें से 65 हजार रुपये वसूले गए। तीन एफआईआर दर्ज हुईं और नौ मामलों में रेड एंट्री की गई। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सबसे अधिक घटनाओं वाले जिलों में कार्रवाई तो हो रही है, लेकिन आग की घटनाओं पर प्रभावी रोक अब भी नहीं लग सकी है।
12 हजार नोडल अधिकारी, फिर भी खेतों में आग
सरकार ने इस बार पराली जलाने की घटनाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए व्यापक एक्शन प्लान तैयार किया है। इसके तहत 12 हजार नोडल अधिकारी तैनात किए गए हैं। करीब 1200 कर्मचारियों वाली पराली प्रोटेक्शन फोर्स भी मैदान में है। पहली बार खेतों में आग की वास्तविक समय में निगरानी के लिए 125 ड्रोन तैनात करने की योजना बनाई गई है। छह जिलों संगरूर, तरनतारन, मोगा, फिरोजपुर, मुक्तसर और मानसा के 23 गांवों को हॉटस्पॉट के रूप में चिह्नित किया गया है। इन गांवों में 2025 के दौरान पराली जलाने की 10 से अधिक घटनाएं सामने आई थीं।
लेकिन निगरानी की इस व्यवस्था में भी सवाल हैं। अभी ड्रोन के जरिये खेतों में पराली जलने की निगरानी शुरू नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, तरनतारन में दिनदहाड़े पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। वहां के कच्चा पक्का और भैणी मंसा सिंह गांवों में खेतों से उठता धुआं सरकारी निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है। मामले की जानकारी दिए जाने पर कृषि विभाग के अधिकारी भूपिंदर सिंह ने कहा कि घटना उनके संज्ञान में आ गई है और जल्द उचित कार्रवाई की जाएगी। सवाल यह है कि जब खेतों में आग दिखाई दे रही है, तो उसे समय रहते रोकने और जिम्मेदार लोगों पर तत्काल कार्रवाई करने में तंत्र कितना प्रभावी साबित हो रहा है।
अमृतसर में निगरानी, लुधियाना में मशीनों पर जोर
जिलों में पराली प्रबंधन के लिए अलग-अलग स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। अमृतसर के मुख्य कृषि अधिकारी अमरजीत सिंह दोसांझ के मुताबिक, बेलर मशीनों की पहुंच बढ़ने और किसानों को जागरूक करने से पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है। पहले जहां करीब 100 मामले सामने आते थे, वहीं अब इनकी संख्या 10 से 12 के आसपास रह गई है। ब्लॉक तरसिक्का और अटारी के हॉटस्पॉट गांवों में विशेष निगरानी की जा रही है। प्रत्येक 100 किसानों पर एक नोडल अधिकारी तैनात किया गया है, जो किसानों को पराली न जलाने और उचित प्रबंधन के लिए प्रेरित करता है। रात में भी टीमें गश्त कर रही हैं।
लुधियाना में कृषि विभाग मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने और जागरूकता अभियान पर जोर दे रहा है। मुख्य कृषि अधिकारी डॉ. गुरदीप सिंह के मुताबिक, मौजूदा सीजन में जिले में पराली जलाने का एक मामला सामने आया है। किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के विकल्प उपलब्ध कराने के लिए अब तक 1350 मशीनों पर करीब 20 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी जा चुकी है। गांव और ब्लॉक स्तर पर जागरूकता शिविर लगाए जा रहे हैं, जबकि फ्लाइंग स्क्वायड की टीमें शाम और रात में गश्त कर रही हैं।
2024 के मुकाबले घटनाओं में कमी लेकिन 2025 के मुकाबले घटनाएं बढ़ा रही चिंता
पराली जलाने की समस्या केवल निगरानी या जुर्माने से हल नहीं हो सकती। धान की कटाई के बाद किसानों के पास फसल अवशेष के निपटारे के लिए पर्याप्त समय, मशीनें और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध होना भी जरूरी है। मशीनों की उपलब्धता, उन्हें खेतों तक समय पर पहुंचाने, किराये पर उपयोग की सुविधा और पराली के संग्रह व इस्तेमाल की व्यवस्था का सीधा असर किसानों के फैसले पर पड़ता है। यदि किसान को पराली हटाने या खेत में मिलाने का विकल्प समय पर नहीं मिलता, तो आग लगाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना मुश्किल हो सकता है।
सरकार की कोशिशों के कारण 2024 के मुकाबले घटनाओं में भारी कमी जरूर आई है, लेकिन 2025 के मुकाबले इस बार बढ़ोतरी चिंता बढ़ाती है। सबसे ज्यादा घटनाओं वाले दो जिलों में कुल मामलों का करीब 80 फीसदी दर्ज होना यह भी बताता है कि एक जैसी रणनीति के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से निगरानी और समाधान की जरूरत है। जहां घटनाएं ज्यादा हैं, वहां अधिकारियों की मौजूदगी, मशीनों की उपलब्धता और शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई को नतीजों से जोड़ना होगा।
पराली जलाने से होने वाला धुआं प्रदूषण की गंभीर समस्या का हिस्सा है, हालांकि वायु गुणवत्ता पर मौसम, हवा की गति और अन्य स्रोतों का भी असर पड़ता है। इसलिए केवल आग की घटनाओं की संख्या से प्रदूषण में कुल बढ़ोतरी या कमी तय नहीं की जा सकती। फिर भी खेतों में जलती पराली का धुआं पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए जोखिम बढ़ाता है।
सरकारी प्रयासों की असली परीक्षा ड्रोन, अधिकारियों और जुर्माने की संख्या नहीं, बल्कि खेतों में आग की घटनाओं में लगातार और टिकाऊ कमी है। जब तक किसानों को व्यावहारिक विकल्प नहीं मिलते, निगरानी समय पर कार्रवाई में नहीं बदलती और नियम तोड़ने वालों के साथ जिम्मेदार तंत्र की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक पराली पर पूरी तरह अंकुश लगाने का दावा अधूरा ही रहेगा।