63 फीसदी प्राइम टाइम टीवी विज्ञापन भारतीय विज्ञापन मानक परिषद की ओर से तय मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं
टमाटरों की ताजगी का विज्ञापन करने वाले एक केचप उत्पाद में केवल 28% टमाटर होते हैं 33.33% चीनी है
विभिन्न ब्रांडों को जवाबदेह बनाने के लिए भारतीय विज्ञापन मानक परिषद को अधिक अधिकार देने की जरूरत
अमर उजाला ब्यूरो
पटियाला। पंजाबी यूनिवर्सिटी में हाल ही में हुए एक अध्ययन से भारतीय टीवी विज्ञापनों में धोखाधड़ी के चौंकाने वाले रुझान का पता चला है। यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता एवं जन संचार विभाग में निगरान प्रोफेसर भुपिंदर सिंह बत्रा के नेतृत्व में शोधकर्ता डॉ. रुचिका की ओर से किए गए इस अध्ययन के तहत टीवी पर आने वाले विज्ञापनों में भारतीय विज्ञापन मानक परिषद द्वारा निर्धारित मानकों के उल्लंघन की जांच की गई है।
शोधकर्ता डॉ. रुचिका ने बताया कि खाद्य एवं पेय उत्पादों के विज्ञापनों पर केंद्रित यह अध्ययन तीन प्रमुख चैनलों पर आधारित था। उन्होंने कहा कि अध्ययन से आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए हैं कि 63 प्रतिशत प्राइम टाइम टीवी विज्ञापन भारतीय विज्ञापन मानक परिषद की ओर से तय मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं। इन 63% विज्ञापनों में से 87.7% में तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया, स्वास्थ्य लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया या अपने उत्पादों के चमत्कारी परिणामों का दावा किया गया। इससे लोगों के विश्वास और सच्ची जानकारी को नुकसान पहुंच रहा है। इनमें से लगभग 91.8% टीवी विज्ञापनों ने परिषद के दो अनुच्छेदों का उल्लंघन किया। उन्होंने कहा कि विज्ञापनों में जंक फूड को पौष्टिक बताया जाना या बच्चों को लक्षित करना आम बात है। 39.7% विज्ञापनों में उत्पाद का सेलिब्रिटी समर्थन शामिल था। उन्होंने कहा कि इनमें से 82% विज्ञापन झूठे दावों से भरे हुए थे, जहां वैज्ञानिक तथ्यों या सत्यापन की तुलना में स्टारडम को प्राथमिकता दी गई थी। इनमें से 42.5% विज्ञापनों में दिए गए अस्वीकरण अस्पष्ट या बहुत छोटे थे, जिसके कारण महत्वपूर्ण स्वास्थ्य जानकारी छिप गई और झूठे दावे भी उजागर हुए। कभी-कभी ऐसे शब्द या भाषा का प्रयोग किया जाता था जो संबंधित टीवी स्टेशन की भाषा से मेल नहीं खाती थी। इनमें से 4.1% विज्ञापन लिंग आधारित भेदभाव को भी बढ़ावा दे रहे थे। अध्ययन में पाया गया कि 58% लोग जानते हैं कि टीवी विज्ञापन भ्रामक हो सकते हैं और 51% लोग उनके दावों पर भरोसा नहीं करते हैं लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो इन विज्ञापनों से प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, 68% लोग खूबसूरती से प्रस्तुत की गई स्वास्थ्य और वजन घटाने की कहानियों से प्रभावित होते हैं। वहीं 59% लोग शर्करा युक्त उत्पादों को विशिष्टता से जोड़ते हैं, और 61% लोग अतिशयोक्तिपूर्ण स्वास्थ्य लाभों से प्रभावित होते हैं।
प्रोफेसर भुपिंदर सिंह बत्रा ने कहा कि यह उच्च-स्तरीय उल्लंघन उपयोगकर्ताओं के लिए गंभीर जोखिम पैदा करता है। खासकर तब जब ये विज्ञापन स्वास्थ्य और पोषण संबंधी तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर रहे हों। उन्होंने कहा कि भारतीय विज्ञापन मानक परिषद की धारा 2 का उल्लंघन करते हुए स्वास्थ्य लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से दर्शकों को यह विश्वास हो जाता है कि साधारण उत्पाद भी औषधीय या अतिशयोक्तिपूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। जिससे गलत खान-पान की आदतें पैदा होती हैं। प्राइम टाइम विज्ञापनों में विज्ञापन में दी गई जानकारी पैकेजिंग पर दी गई जानकारी और वास्तविक सामग्री के बीच एकरूपता का अभाव (अनुच्छेद 8) भी अधिक पाया गया है, जो उपयोगकर्ताओं को गलत निर्णय लेने के लिए प्रोत्साहित करता है। उन्होंने कहा कि अध्ययन से पता चला है कि बिस्कुट के लगभग 60% टीवी विज्ञापन दर्शकों को यह विश्वास दिलाते हैं कि बिस्कुट में ब्रेड और दूध के समान ही पोषण होता है। जबकि वास्तविकता यह है कि बिस्कुट में चीनी और मैदा भरपूर मात्रा में होता है। इसी प्रकार, एक टोमैटो केचप ब्रांड अपने विज्ञापन में दावा करता है कि यह आपकी साधारण रोटी-सब्जी को स्वादिष्ट रोल में बदल सकता है, तथा ताजे टमाटरों को जादुई तरीके से सॉस में बदल देता है। लेकिन वास्तविक सच्चाई यह है कि इस उत्पाद में केवल 28% टमाटर और 33.33% चीनी है, प्रत्येक 15 ग्राम में 4.8 ग्राम चीनी है - यानी 100 ग्राम में 32 ग्राम चीनी - और इसमें परिरक्षक 211 भी है, जो ताजगी के दावे को झूठलाता है।
उन्होंने कहा कि अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि भारतीय विज्ञापन मानक परिषद को इस मामले में विभिन्न ब्रांडों को जवाबदेह ठहराने के लिए अधिक अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है। जैसे यह कानून बनाना कि पोषण संबंधी दावे स्क्रीन पर पूरे पांच सेकंड तक स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किए जाएं। इसी प्रकार जो सेलिब्रिटी किसी उत्पाद का प्रचार कर रहे हैं, उन्हें लिखित जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि उत्पाद स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है तथा विज्ञापन में दी गई सभी जानकारी सत्य है। उन्होंने कहा कि हमें एक अभियान चलाने की भी आवश्यकता है ताकि लोग लेबल पढ़ने और उत्पाद की सामग्री को समझने के बारे में बुनियादी जानकारी प्राप्त करें और यह समझें कि टीवी विज्ञापनों में दी गई जानकारी पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।