पंजाब के लोक नाच गिद्दा और शास्त्रीय नृत्य कथक में काफी समानता है। ये पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी के नृत्य विभाग की ओर से किए गए शोध में साबित हुआ है। विभाग ने दोनों तरह के नृत्य की आपसी समानताओं को तलाशा। दोनों नृत्यों की अलग-अलग शैलियां होने के बावजूद इस शोध अध्ययन के जरिये इन दोनों में भावों के आधार पर समानता देखने को मिली है।
लोक नृत्य गिद्दा और शास्त्रीय नृत्य कथक की संचार विधियां-एक तुलनात्मक अध्ययन नाम का यह शोध कार्य डॉ. इंदिरा बाली की निगरानी में शोधकर्ता किरनप्रीत कौर की ओर से किया गया है। किरनप्रीत कौर ने बताया कि लोक नाच गिद्दा और शास्त्रीय नृत्य कथक में समानता के नतीजे कलाओं के क्षेत्र से संबंधित पुरातन व प्रमाणित भारतीय ग्रंथ नाट्य शास्त्र को आधार बनाकर निकाले गए हैं, जो भरत मुनि की ओर से रचित है।
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अपनी तरह का पहला शोध
उन्होंने बताया कि पंजाब के लोक नृत्य के क्षेत्र में यह अपनी किस्म का पहला शोध कार्य है, जहां महिलाओं के लोक नृत्य गिद्दा को भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक के साथ नाट्य शास्त्र के हवाले से तुलना में रखकर अध्ययन किया गया है। इसका लाभ दोनों नृत्य के क्षेत्रों के साथ संबंधित लोगों को मिलेगा। डा. इंदिरा बाली ने बताया कि इस शोध कार्य के अधीन गिद्दा व कथक दोनों ही नृत्य शैलियों के तकनीकी पक्ष को जांचा गया, जिसमें 25 हस्त मुद्राएं, एक पद संचालन, एक भ्रमरी का प्रकार और कसक-मसक के लिहाज से आपसी सांझ व समानता के प्रमाण सामने आए हैं।
नृत्य पक्ष में नाट्य शास्त्र में दर्ज अष्ट नायिकाओं में से दोनों नृत्य में आपस में मेल खेती पांच नायिकाओं व चार रस देखे गए हैं। नाट्य पक्ष में अभिनय के चार तत्व आंगिक, वाचिक, आहारिय, सात्विक व चेहरे के हाव-भाव के सुमेल की इन दोनों कलाओं में बारीकी के साथ तुलना की गई है। उन्होंने कहा कि यह शोध कार्य कलाओं के प्रशिक्षार्थियों, शोधकर्ताओं व विद्यार्थियों के लिए दोनों नृत्य को बेहतर तरीके से समझने व पेशकारी के लिए एक प्रमाणित स्रोत का काम करेगा।
कलाकारों के लिए यह शोध लाभदायक होगा
वीसी प्रोफेसर अरविंद ने इस शोध कार्य की सराहना करते शोध टीम को बधाई दी। साथ ही कहा कि इस शोध के जरिये भाषा व सभ्याचार के सुमेल का मकसद पूरा होता है। वहीं नृत्य क्षेत्र में दिलचस्पी रखने वाले कलाकारों के लिए यह शोध कार्य लाभदायक होगा। जो इन दोनों नाच कलाओं को सीखने या सिखाने का काम करना चाहते हैं।