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जत्थेदार ही बुला सकते हैं सरबत खालसा: मक्कड़

Fri, 06 Nov 2015 10:26 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोपड़
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डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को माफी और श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के बाद पैदा हुए हालातों के कारण सिख जत्थेबंदियो की ओर से 10 नवंबर को सरबत खालसे बुलाने के मुद्दे को लेकर शुक्रवार को श्री आनंदपुर साहिब में विरासत ए खालसा के आडीटोरियम में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने विचार गोष्ठी आयोजित की।
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कार्यक्रम में प्रदेशभर से आए विद्वानों ने विचार रखे। इस दौरान सरबत खालसा के विरोध में एक प्रस्ताव भी पास किया गया।

एसजीपीसी पभनधान अवतार सिंह मक्कड़ ने कहा कि सिख इतिहास में आज तक दो ही सरबत खालसा बुलाए गए। पहला सरबत खालसा 20 दिसंबर 1920 मे  बुलाया गया था। इस के बाद दिसंबर 1984 में सरबत खालसा बुलाया गया था। उस समय श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार की ओर से ही सरबत खालसा बुलाया गया था।

उन्होंने इस समय सरबत खालसा बुलाने को पंथ के विरोध में बताते हूए कहा कि यह श्री अकाल तख्तत साहिब की मर्यादा के खिलाफ है । उन्होंने कहा कि सरबत खालसा को बुलानेे का अधिकार सिर्फ तख्तों के जत्थेदारों को ही है। डॉ. दलजीत सिंह चीमा  ने कहा  विद्वानों के  विचार सुन कर बुहत ही सीखने को मिला है। सभी ने सरबत खालसा के मुदे पर अपने अपने विचार दिए है ।
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उन्होंने कहा कि 10 नवंबर को होने वाली एकत्रता को  सरबत खालसा नही कहा जा सकता है। लोकसभा मेंबर पभनेम सिंह चंदूमजारा ने कहा कि सरबत खालसा बुलाना सिखों में खाना जंग कराना है।

गोष्ठी में डॉ. सुखदयाल सिंह ने कहा कि आम हालातों में जत्थेदार ही सरबत खालसे को बुला सकते है लेकिन जब हालात सामान्य न हो तो सिख जत्थेबंदियां सहमती से सरबत खालसा बुला सकती हैं।

डॉ. परमवीर सिंह ने कहा कि जिस तरह आज संकट के समय में विद्वानों को याद किया गया है। डेरा सच्चा सौदा के मसले के पहले ही विद्वानों से सलाह ली गई होती तो इस तरह के हालात पैदा न होते।

डॉ. हरपाल सिंह पंनू ने डेरा सच्चा सौदा मामले पर शिरोमणि अकाली दल के प्रधान और एसजीपीसी के पभनधान को माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो सरबत खालसा बुलाने वाली जत्थेबंदिया पंथ की हिमायती हैं।
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