अमृतसर पुलिस की तरफ से दिसंबर 1993 में जिन चार महिलाओं के माथे पर जेबकतरी शब्द गुदवाया गया था, उन महिलाओं का परिवार 22 साल से अपने गांव में सामाजिक बहिष्कार का शिकार हो रहा है। 22 साल की लंबी अदालती लड़ाई में आरोपी पुलिस अधिकारियों को तीन साल की सजा तो सुनाई गई लेकिन पीड़ितों के लिए काफी नहीं है। वहीं इस लंबी लड़ाई ने इन परिवारों को आर्थिक तौर पर भी तोड़ दिया है। मालेरकोटला के गांव बागड़िया की पीड़ित गुरदेव कौर ने केस लड़ने के लिए साहूकार से जो कर्ज लिया था, उसके ब्याज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है।
गुरदेव कौर के बेटे पप्पू सिंह ने बताया कि घटना के समय वह छठी कक्षा में पढ़ता था। स्कूल में कुछ भी चोरी होता, सबसे पहले उसकी जेब की यह कहकर तलाशी ली जाती कि यही जेब कतरी का बेटा है। गांव की ओर जाने वाली बस में से उस समय गांव के जमींदार ने भी उस पर यही तोहमत लगाकर बस से उतार दिया था। गांव में किसी भी घर में जाने की इजाजत छीन ली गई थी और बच्चों ने भी अपने साथ खेलने से इंकार कर दिया था।
उसने बताया कि घटना के एक साल में ही उसके पिता ऐसी प्रताड़नाओं से परेशान होकर चल बसे। अब इतने सालों बाद तीन साल की सता के फैसले से वह खुश नहीं हैं। अधिक सजा के लिए उच्च न्यायालय में गुहार लगाने के लिए पैसे नहीं हैं। घर टूट चुका है, समाज उन्हें दुत्कार चुका है, कर्ज बढ़ता जा रहा है। सरकारी मुआवजा मिलने की उम्मीद भी नहीं है। गुरदेव कौर ने कहा कि चार बार माथे की सर्जरी करवाने के बावजूद दाग नहीं मिटे।
गुरदेव कौर, परमेश्वरी देवी, सुरजीत कौर और महिंदर कौर ने 1994 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गुहार लगाई थी कि आठ दिसंबर 1993 को अमृतसर के बस स्टैंड से एएसआई कंवलजीत सिंह ने उठाकर नाजायज हिरासत में रखकर एसपी सुखदेव सिंह के इशारे पर उनके माथे पर जेब कतरी गुदवा दिया था। हाईकोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज की गई और सात अक्तूबर को आरोपी पुलिस अधिकारियों को सजा सुनाई गई है।