सर्पदंश से बचने को गुग्गा पीर की पूजा
नाग देवता को प्रसन्न करने व परिवार की रक्षा के लिए मनाया जाता है यह पर्व
अमर उजाला ब्यूरो
राजपुरा
श्रावण मास की पहली संक्रांति पर सोमवार को गुग्गा पर्व बहुत ही श्रद्धा व धूमधाम से मनाया गया। मान्यता है कि श्रावण माह में नाग देवता पाताल छोड़ कर जमीन पर आ जाते हैं और उनसे सुरक्षा पाने के लिए ये पर्व नागों के देवता गुग्गा पीर को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है ताकि उनकी दया दृष्टि परिवार पर बनी रहे।
बुजुर्ग महिला जयवंती का कहना है कि श्रावण माह में बारिश शुरू हो जाती है। सूर्य की प्रचंड गर्मी से तप रही धरती ऊपर से शीतल हो जाती है। बारिशों का पानी बहुत ज्यादा गहराई तक धरती को शीतल नहीं कर पाता। इससे धरती के अंदर की गर्मी और ऊपर से शीतल हुई पृथ्वी के गीलेपन से पृथ्वी के अंदर भाप बनने से घबरा कर सर्प जातियां बाहर निकल आती हैं। सावन भादो चौमासे में अधिकतर सर्पदंश की घटनाएं देखने सुनने को मिलती है। इसलिए सावन महीने में ही गुग्गा पीर का पर्व मनाया जाता है।
उन्होंने बताया गुग्गा पूजन के समय महिलाएं श्रावण की पहली संक्रांत को कीकर की झाड़ियों की पूजा करती हैं। पूजन में सबसे पहले झाड़ी पर चीनी मिश्रित दूध छिड़का जाता है। फिर मैदे की बनी हुई मोटी सर्पाकार सेवाइयां और मैदे के बने अखे डाले जाते हैं। फिर सूत का धागा झाड़ी पर बांधा जाता है, जिसे गुग्गा पीर का जनेऊ कहते हैं, वास्तव में ये रक्षाबंधन होता है, जिसे बंाध कर महिलाएं गुग्गा पीर से प्रार्थना करती हैं कि हम पर कृपा करें, पूरी सर्प जाति आप का कहना मानती है, इसलिए मेरे परिवार के सभी सदस्यों की आप रक्षा करना। गुग्गा पीर की पगड़ी के रूप में कपास भी झाड़ी पर रखा जाती है।
पूजन के बाद घर आकर महिलाएं घर के सभी कमरों में चीनी मिश्रित दूध के छींटे डालती है। रात को मैदे की बनी सेवाईयां पानी में उबालकर दूध व चीनी के साथ पूरे परिवार के साथ मिलकर खाते हैं। उस रात रोटी सब्जी या अन्य पदार्थ नहीं खाए जाते। ब्राह्मण समाज के प्रमुख चुरंजी शर्मा का कहना है कि अगर गुग्गा पीर पूजा से कोई परिवार वंचित रह जाए तो सावन की संक्रांति के दो सप्ताह बाद आने वाले रविवार के दिन भी पूजा कर सकते हैं।