शौर्य चक्र विजेता शहीद कर्नल जयदीप सिंह सलारिया का 12वां श्रद्धांजलि समारोह उनके गांव पंगोली में बने स्मारक के समक्ष आयोजित हुआ। शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष रिटायर्ड कर्नल सागर सिंह सलारिया की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यातिथि के रूप में डिप्टी स्पीकर दिनेश सिंह बब्बू उपस्थित हुए।
जबकि विशेषातिथि के रूप में शहीद कर्नल जयदीप सिंह सलारिया की पत्नी डा. अनुराधा राजपूत एवं बेटी आकांक्षा सलारिया उपस्थित हुईं। डिप्टी स्पीकर दिनेश सिंह बब्बू ने कहा कि बहादुरी का दूसरा नाम शहीद कर्नल जयदीप सिंह सलारिया है। उनकी शहादत को शत शत नमन है। ऐसे शूरवीरों के बलिदान के कारण ही हमारे सीमा प्रहरियों का मनोबल हमेशा ऊंचा रहता है।
शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविन्द्र सिंह विक्की ने बताया कि जयदीप सलारिया ने अदम्य साहस की अनूठी इबारत लिखी। उन्हें दो बार शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। उनका जन्म 7 जुलाई 1961 को पिता कर्नल रंधीर सिंह व माता पूरो देवी के घर हुआ। वह 1983 में 5 डोगरा यूनिट में शामिल हुए। 18 अगस्त 2002 को जम्मू कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र नौशहरा सेक्टर में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान वे शहीद हुए थे।
वहीं परिषद महासचिव कुंवर रविन्द्र सिंह विक्की, मेजर शौर्यवीर सिंह, जिला एनआरआई सभा अध्यक्ष एनपी सिंह, ब्रिगेडियर एनएस बराड़, 16 डोगरा यूनिट के कमांडिंग आफिसर कर्नल अमित कुमार, कर्नल प्रभात जसरोटिया, कर्नल तीर्थ सिंह भी उपस्थित हुए। सबसे पहले 16 डोगरा यूनिट के जवानों की ओर से सलामी दी गई। शहीद कर्नल जयदीप सलारिया की पत्नी तथा बेटी ने भी श्रद्धासुमन अर्पित किए।
इस दौरान डिप्टी स्पीकर की ओर से शहीद कर्नल जयदीप सिंह की पत्नी तथा बेटी को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ब्रिगेडियर प्रहलाद सिंह, कर्नल एनएस चौहान, ठाकुर नरिन्द्र सिंह, मेजर जतिन्द्र त्यागी, सुबेदार मेजर शाम सिंह, कर्नल सुनीत पठानियां, कैप्टन प्रीतम सलारिया, सुबेदार अवतार सिंह सैनी, सुदर्शन सलारिया उपस्थित थे।
भावुक हुईं बेटी और पत्नी
श्रद्धांजलि समारोह के दौरान शहीद कर्नल सलारिया की बेटी तथा पत्नी भावुक हो उठीं। अपने पिता की शहादत को याद करते हुए बेटी आकांक्षा ने बताया कि उन्हें अपने पिता की शहादत पर गर्व है। उनके बलिदान से देश की भावी पीढ़ी हमेशा प्रेरणा लेती रहेगी। उसने कहा कि जब उनके पिता शहीद हुए थे तब वह आठ वर्ष की थी। इस समय उनके पिता के शहीद होने का समाचार सुनकर वह अचंभित रह गई। इसके बाद उसकी माता ही उसका सहारा रहीं। वह समय उपके परिवार के लिए मुश्किलों भरा था। आज भी पिता की याद उनको सहारा देती है।