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फ्लाईओवर से सीधा रास्ता नहीं दिया तो गांवों में नेताओं की नो एंट्री

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मोहाली। खरड़-बलौंगी हाईवे पर बन रहे फ्लाईओवर की वजह से एतिहासिक गांव दाऊं समेत 25 गांवों को खरड़ की ओर से जाने के लिए अभी तक सीधा रास्ता नहीं दिया गया है। इसकी मांग के लिए ग्रामीण संघर्ष कर रहे हैं तो उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, अब गांव के लोगों ने फ्लाईओवर से सीधा रास्ता लेने के लिए संघर्ष करते हुए आरपार की जंग लड़ने का फैसला लिया है। उन्होंने तय किया है कि अगर ग्रामीणों से वोट मांगने वाले नेता उन्हें रास्ता नहीं दिला सकते तो चुनाव के समय वोट मांगने के लिए उनकी गांवों में एंट्री नहीं करने दी जाएगी।
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इतना ही नहीं नेताओं के विरोध के लिए बाकायदा बैनर तैयार किए गए हैं। जो कि गांव के एंट्री प्वाइंट से लेकर प्रत्येक प्रमुख स्थान पर लगाए गए हैं। इसके साथ ही नेताओं की ओर से जो वायदे किए गए थे। उनकी वीडियो भी जारी कर काली दिवाली मनाने का फैसला लिया है। लोगों ने साफ किया है कि वह गांव के लिए सीधे रास्ते के लिए अब अपनी जंग जारी रखेंगे और जरूरत पड़ी तो अदालत में जाने से भी नहीं हटेंगे।
जानकारी के मुताबिक खरड़-बलौंगी हाईवे पर रोजाना लगने वाले ट्रैफिक जाम से लोगों को छुटकारा दिलाने और उनकी सुविधा के लिए ही फ्लाईओवर बनाया जा रहा है। लेकिन इसकी वजह से गांव दाऊं समेत 25 गांव और कई रिहायशी सोसायटी के लोग आफत में आ गए हैं। क्योंकि उनके गांव से अगर किसी ने खरड़ की ओर जाना हो तो उसे एक किलोमीटर से घूम कर आना पड़ता है। जबकि गांव दाऊं एक एतिहासिक स्थल है और यहां हर रविवार को मेला लगता है। इसके अलावा माघी का मेला भी होता है, इसमें सैकड़ों लोग शामिल होते हैं। अब गांव को सीधा रास्ता नहीं मिलने से सभी लोग दिक्कत में आ गए हैं। इस रास्ते के लिए गांव वाले लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैें।
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वहीं, गांवों के लोगों ने प्रशासन को पहले अल्टीमेटम देकर हाईवे पर गांवों को रास्ता देने की अपील की थी। लेकिन जब बात नहीं बनी थी तो उन्होंने 10 अक्तूूबर को हाईवे पर करीब एक घंटे तक ट्रैफिक जाम जाम लगाया था। इस मौके पर एसडीएम खरड़ हिमांशु जैन और पुलिस के अधिकारी भी पहुंचे थे और इस दौरान फ्लाईओवर का काम रुकवा दिया गया था और कहा था कि जल्दी ही उन्हें रास्ता दिलाने की कार्रवाई की जा रही है। लेकिन जब बात नहीं बनी तो लोगों ने दोबारा संघर्ष शुरू किया था।
अब लोगों का कहना है कि उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। प्रशासन और पुलिस भी संघर्ष पर चलने वाले लोगों को धमका रही है। उन पर केस दर्ज करने की धमकियां दी जा रही हैं, जिसके बाद उन्होंने तय किया है कि अगर राजनीतिक पार्टियां उन्हें रास्ता नहीं दिला सकतीं तो वह फिर चुनाव के समय वोट मांगने के लिए भी गांव में न आएं।
नेताओं ने किया था वायदा, गोद लेने वाले भी भूले
इस मौके पर गांव के लोगों ने बताया कि वह काफी समय से संघर्ष कर रहे हैं। इस दौरान सत्ताधारी कांग्रेस से लेकर, बीजेपी और अकाली दल के नेताओं की ओर से वायदे किए गए। लेकिन यह बात सिरे नहीं चढ़ पाई। जबकि पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने तो यह गांव गोद लिया हुआ था, इसके बाद भी कुछ नहीं बन पाया। वहीं, सेहत मंत्री बलबीर सिंह सिद्घू से भी उम्मीदें काफी थी। लेकिन वहां से भी निराशा ही हाथ लगी। यही हाल बीजेपी के नेताओं का था। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री पंजाब को भी पत्र लिखा गया था और उन्होंने भी लोगों को रास्ता दिलाने के लिए हामी भरी थी।
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