जीरकपुर। चातुर्मास के दौरान जैन सभा जीरकपुर में प्रवचन कार्यक्रम में सोमवार को महासाध्वी श्री मधुरता जी महाराज ने कहा कि साधारण मनुष्य अपनी भाषा का प्रदर्शन करते हैं। थोड़ा बहुत ज्ञान होने पर उनमें अभियान आ जाता है। जिस तरह से अधभरा पात्र अधिक छलकता है, लेकिन भरी हुई गागर नहीं छलकती है। इस प्रकार थोड़ा ज्ञान आने पर व्यक्ति में अभिमान आ जाता है। उसमें केवल बौद्धिक ज्ञान होता है, अनुभव नहीं होता। इसलिए बौद्धिक ज्ञान के साथ-साथ अनुभव का होना बहुत जरूरी है। उन्होंने बताया कि आत्मा निराकार है, जो शरीर को लेकर उत्पन्न होती है, आत्मा अटल है, किंतु शरीर परिवर्तनशील है। शरीर में बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था आती है। आत्मा और शरीर के भेद के बारे में बड़े ही सुंदर शब्दों में फरमाया है।