दूसरे लॉकडाउन के बाद उत्पादन बढ़ने लगा था, लेकिन हफ्ते में तीन दिन यूनिट बंद रखने से फिर हालात बिगड़ने लगे हैं। तीन दिन यूनिट बंद रहने से समय पर ऑर्डर पूरे नहीं हो पाएंगे। राज्य में बिजली संकट के कारण सप्लाई चेन टूट गई है। कोरोना के कारण पहले ऑर्डर नहीं थे, ऑर्डर आए तो लेबर नहीं थी, अब लेबर लौटी तो बिजली संकट ने उत्पादन ठप कर दिया। उद्योग राजस्व व रोजगार का मुख्य जरिया हैं। सरकार को उसे बचाना चाहिए। तुरंत बिजली संकट का हल निकाले। हालात ऐसे ही रहे तो पलायन करना उद्योगों की मजबूरी हो जाएगी। - योगेश सागर, प्रधान मोहाली इंडस्ट्रियल एसोसिएशन
महंगी बिजली खरीदने के बावजूद तीन दिन का कट
पंजाब में आने वाला समय उद्योगों के लिए काला समय साबित होगा। पहले दो लॉकडाउन से नुकसान हुआ और अब बिजली संकट ने तो रीढ़ की हड्डी ही तोड़ दी है। लॉकडाउन के बाद अब तीन दिन का कट, वह भी देश में सबसे महंगी बिजली इस्तेमाल करने के बावजूद। उद्योग 10 से 11 रुपये प्रति यूनिट बिजली का भुगतान करते हैं, जबकि पड़ोसी राज्यों में बिजली पंजाब के मुकाबले 30 से 35 प्रतिशत सस्ती है। सरकार अगर सभी सुविधाएं दे कर उद्योगों को चलाने में मदद करे तब भी दूसरे लॉकडाउन के असर से उबरने में तीन माह का समय लगेगा। - संजीव वशिष्ठ, पूर्व प्रधान, मोहाली इंडिस्ट्रयल एसोसिएशन
कोरोना का असर हर तरह के उद्योगों पर एक सा नहीं रहा। हालांकि बिजली संकट का असर एक जैसा है। बिजली संकट मौसम के कारण है, जो अगले कुछ दिनों में ठीक हो सकता है। हालांकि कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें सरकार ठीक कर सकती है, लेकिन नहीं कर रही। कच्चे माल के दामों को नियंत्रित करना केंद्र सरकार के हाथ में है, लेकिन कुछ बड़े औद्योगिक घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए दाम नियंत्रित नहीं किए जा रहे। ट्रैक्टर, ऑटो व टू-व्हीलर पार्ट्स, ट्रांसफार्मर व कृषि क्षेत्र से जुड़े उद्योगों पर कोरोना का खास प्रभाव नहीं रहा। ज्यादा असर सर्विस सेक्टर, रेलवे से जुड़े उद्योगों व गारमेंट्स जैसे सेक्टर पर पड़ा। - गगन छाबड़ा, उद्योगपति, आर्डिसन्स एसोसिएट्स मोहाली
मैनपावर की कमी और पावर कट, ऊपर से कच्चे माल की कमी ने उद्योग चलाना मुश्किल कर दिया है। सितंबर 2020 से लेकर अभी तक कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होने वाले लोहे की कीमतों में 15 रुपये प्रति किलो का इजाफा हुआ है। कच्चे माल के दामों में इतने कम समय में इतना अधिक उछाल कभी नहीं आया। बिजली संकट की वजह से राज्य में आयरन इंडस्ट्री पूरी तरह से बंद है। अब इस वजह से भी कच्चा माल नहीं मिल पा रहा। अगर कच्चा माल ही नहीं होगा तो ऑर्डर होने के बावजूद उत्पादन कैसे होगा। - अमन दुप्पर, उद्योगपति, ओहरी इंडस्ट्रीज, मोहाली
मोहाली जिले में डेराबस्सी व कुराली सहित करीब 13000 औद्योगिक यूनिट हैं। इनमें से करीब 2000 यूनिट बंद पड़ी हैं। यह सभी छोटी यूनिट हैं, जो कोरोना काल में बंद हो गईं या फिर पड़ोसी राज्यों में चली गईं। मोहाली में 70 फीसदी उद्योग ट्रैक्टर व ऑटो पार्ट्स से जुड़े हैं। इसके अलावा रेलवे, सर्विस इंडस्ट्री, ट्रांसफार्मर, केमिकल, प्रिंटिंग, फार्मा, सेनेटरी व आईटी इंडस्ट्री की यूनिट भी हैं। मोहाली के उद्योग, आस्ट्रेलिया, यूरोप, अमेरिका व मिडल ईस्ट के देशों में अपने उत्पाद निर्यात करते हैं। मोहाली के उद्योगों का सालाना टर्नओवर तकरीबन 35 हजार करोड़ है। करीब 12 हजार करोड़ का टर्न ओवर तो आईटी इंडस्ट्री का ही है। मोहाली की इंडस्ट्री 3.5 लाख लोगों को रोजगार देती है।
बिन बिजली सब सूना
औद्योगिक इकाइयों की सभी मशीनों को जेनरेटर के सहारे नहीं चलाया जा सकता। योगेश सागर बताते हैं कि अगर 100 किलोवाट क्षमता वाली यूनिट को 8 घंटे जेनरेटर पर चलाया जाए तो 800 लीटर डीजल खर्च होगा। तब भी सभी मशीनें नहीं चल पाएंगी और एकल शिफ्ट में ही काम हो पाएगा। डीजल का दाम इस समय 92 रुपये के करीब है, लिहाजा 73 हजार रुपये के करीब अतिरिक्त खर्च उद्योगपति को रोजाना उठाना पड़ेगा। इसलिए डीजल के सहारे इंडस्ट्रियल यूनिट चला पाना संभव नहीं है।
दुकानदार झेल रहे डबल घाटा
कोविड-19 के चलते हम दुकानदारों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है। क्योंकि सरकार द्वारा दुकानों को बंद करवाकर लॉकडाउन की घोषणा की गई, जिसके चलते लेबर तबका अपने-अपने राज्य लौट चुका था और लेबर न होने की वजह से दुकानों के अंदर पड़ा सामान बेकार हो गया। दूसरी ओर, सामान खराब होने के वजह से दुकानदार को दोगुना घाटा झेलना पड़ा। एक तो दुकान के अंदर पड़ा सामान खराब हो गया और दूसरा दुकानदार को अपनी दुकान को दोबारा पटरी पर लाने के लिए निवेश की जरूरत पड़ी। -हरीश गर्ग, अध्यक्ष, कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्ज (कैट), चंडीगढ़।
डेराबस्सी में 400 औद्योगिक इकाइयां हैं, जिनमें फार्मा, केमिकल, पेपर मिल, स्टील पाइपस, स्पीनिंग मिल, बॉटलिंग के अलावा प्लास्टिक से जुड़े उत्पाद बनते हैं। डेराबस्सी इंडस्ट्री से करीब 40 हजार लोगों को रोजगार मिल रहा है। कोविड-19 की दूसरी लहर का असर पहली जैसा ही रहा, क्योंकि मजदूर वर्ग इंडस्ट्री के लिए रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है, जो लॉकडाउन में अपने-अपने घर चले गए और इंडस्ट्री का काम अगले महीनों तक के लिए लटक गया। डेराबस्सी के अंदर सभी तरह की इंडस्ट्री हैं। कोविड-19 की वजह से लोगों की खरीद क्षमता कम हुई है। इससे खपत में भी कमी हुई है। -विजय मित्तल, प्रधान, डेराबस्सी इंडस्ट्री एसोसिएशन।
डेराबस्सी और लालड़ू क्षेत्र को मिलाकर कुल 800 से 900 इकाइयां हैं, जिनके अंदर केमिकल, फार्मा, आटोमोबाइल आदि शामिल हैं और इनके अंदर कामगारों की गिनती 40 हजार से अधिक है। लॉकडाउन की वजह से दुकानों को बंद किया गया, जिसका सीधा असर हमारी उन इकाइयों पर पड़ा, जिनमें टेक्सटाइल, इलेक्ट्रिकल गुड्स शामिल हैं। इसी तरह, 25 से 30 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयां ऐसी हैं, जिनमें आटोमोबाइल व ट्रैक्टर शामिल हैं, जिन पर असर नहीं हुआ। लेबर न होने की वजह से ऑर्डर को समय पर देने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। औद्योगिक इकाइयों को सबसे ज्यादा प्रभावित कच्चे माल की कीमतों ने किया है। -राकेश अग्रवाल, सचिव, डेराबस्सी इंडस्ट्री एसोसिएशन।