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लॉकडाउन खुलने के साथ ही शहर में बढ़ने लगा पर्यावरण प्रदूषण का स्तर

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मोहाली। कोरोना महामारी के चलते जहां आम जनजीवन पटरी से उतरा हुआ है, वहीं पर्यावरण को इसका फायदा हुआ है। कोरोना के कारण पूरी दुनिया में लॉकडाउन चल रहा था। इस दौरान न वाहन, न इंडस्ट्रीज, न मशीनों का शोर और न ही सड़कों-गलियों में कचरा फैल रहा था।
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मोहाली और चंडीगढ़ सहित पूरे पंजाब में लॉकडाउन के चलते जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण में भारी कमी आई। अब जब हम अनलॉकिंग की तरफ बढ़ रहे हैं तो प्रदूषण का स्तर भी बढ़ने लगा है। इस सब के बीच आज हम विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं।
मोहाली सहित पूरे पंजाब में गर्मियों के दौरान आम तौर पर प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता था। इन दिनों जहां तापमान का स्तर भी पिछले कई साल की अपेक्षा कम है, वहीं वायु प्रदूषण सहित जल और ध्वनि प्रदूषण में भी कमी आई है।
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आज पर्यावरण कार्यकर्ता इसे लेकर चिंतित हैं। इस साल का पहला दिन जहां प्रदूषण के मॉडरेट स्तर के साथ शुरू हुआ था, वहीं लॉकडाउन के दौरान अप्रैल के 24 दिन प्रदूषण का स्तर ग्रीन जोन में रहा। महज 6 दिन एयर क्वालिटी इंडेक्स में इजाफा दर्ज किया गया। मई में भी 3 दिन ही एयर क्वालिटी इंडेक्स माडरेट स्तर पर पहुंचा। अप्रैल में एयर क्वालिटी इंडेक्स का अधिकतम स्तर 82 तक पहुंचा, जबकि न्यूनतम स्तर 26 दर्ज किया गया। मई में एयर क्वालिटी इंडेक्स का अधिकतम स्तर 132 पर पहुंच गया, वहीं न्यूनतम स्तर भी 31 रहा।
वीरवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 56 दर्ज किया गया, बुधवार को भी प्रदूषण का स्तर यही था।
हरियावल मुहिम के जिला संयोजक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता बृज मोहन जोशी इस बारे में बताते हैं कि लॉकडाउन में वायु प्रदूषण ही नहीं बल्कि जल प्रदूषण में भी भारी कमी आई है। 2-4 महीने पहले तक जहां सरकार अभियान चला रही थी और इस पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही थी, लॉकडाउन के बाद इसके प्रदूषण में 35 से 50 प्रतिशत की कमी आई है। लॉकडाउन के बीच पंजाब की नदियों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) में भारी गिरावट आई है और ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ी है। लॉकडाउन के बीच इंडस्ट्री और सीवरेज वेस्ट आना कम हुआ। लॉकडाउन के दौरान ध्वनि प्रदूषण में 5 से 10 डेसीबल (डीबी) की कमी आई थी।
हालांकि, रिहायशी इलाकों में इसका ज्यादा असर देखने को नहीं मिला, लेकिन जिन इलाकों में ट्रैफिक की समस्या ज्यादा रहती है, वहां लॉकडाउन के चलते ध्वनि प्रदूषण में भारी असर देखने को मिला। भीड़भाड़ वाले इलाकों में जहां दिन के समय ध्वनि प्रदूषण का सामान्य स्तर 55 और रात में 45 डीबी होता था, वहां लॉकडाउन से पर्यावरण को बहुत लाभ हुआ है। अनलॉकिंग के ही साथ ही इसमें भी इजाफ होना शुरू हो गया है। ध्वनि प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण हमेशा से ही वाहन रहे हैं, जिनकी आवाज से बड़े शहर ही नहीं बल्कि छोटे शहर भी परेशान हैं। वहीं लॉकडाउन के बीच ना सिर्फ वाहनों की आवाजाही पर पाबंदी रही, बल्कि बड़े कार्यक्रमों पर भी रोक लगी रही। ऐसे में हर तरफ ध्वनि प्रदूषण में कमी आई। अब जैसे जैस जन जीवन सामान्य होगा इनमें इजाफा होगा।
कब शुरू हुआ पर्यावरण दिवस मनाने का चलन
प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टॉकहोम, स्वीडन में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का जन्म हुआ। यहीं प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने ‘पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव’ विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक कदम था। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 19 नवंबर 1986 से लागू हुआ। उसके तहत जल, वायु, भूमि इन तीनों से संबंधित कारक और मानव, पौधों, सूक्ष्म जीव, अन्य जीवित पदार्थ आदि पर्यावरण के अंतर्गत आते हैं।
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