कार्यक्रम में संबोधित करते संजय शुक्ला।
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जीरकपुर। जीरकपुर में तिब्बत की आजादी के लिए भारत -तिब्बत संवाद मंच की केंद्रीय कोर ग्रुप की बैठक हुई। इसमें दिल्ली, हिमाचल, अरुणाचल, उत्तरप्रदेश समेत अनेक राज्यों के और कुछ देशों से तिब्बत प्रेमी शामिल हुए। इसमें कहा गया कि तिब्बत की आजादी का संबंध भारत के विकास और सुरक्षा से जुड़ा है। मंच अपने 20 राज्यों की इकाइयों के माध्यम से विभिन्न राज्यों के राज्यपालों को ज्ञापन देकर मांग करेगा कि भारत में तिब्बत को एक देश के रूप में मान्यता दी जाए।
बैठक में मुख्य मेहमान के रूप में शामिल हुए हरियाणा साहित्य अकादमी के निर्देशक और हरियाणा उर्दू अकादमी में उप चेयरमैन डॉ. चंद्र त्रिखा ने कहा कि तिब्बत के मामले को समझने से पहले तिब्बत की संस्कृति को समझना जरूरी होगा। उन्होंने कहा कि तिब्बत की भूमि रहस्यमयी और अध्यात्म की भूमि है। तिब्बत की संस्कृति की पुस्तकों की भारत में भी संभाल नहीं हो रही।
भारत भी दशकों से तिब्बती लोगों को तो संभाल रहा है और समर्थन भी कर रहा है, परंतु तिब्बत को अलग देश के रूप में मान्यता नहीं दे रहा। उन्होंने कहा कि चीन के धोखा देने की नीति कोई नई नहीं है। चीन की वस्तुओं का बहिष्कार व्यावहारिक जरूरत है जबकि चीनी सामान की खरीद का अर्थ चीन को मजबूत करके भारत को कमजोर करना है।
स्कूलों में तिब्बत और ल्हासा की शिक्षा की जाए
भारत-तिब्बत संवाद मंच के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. संजय शुक्ला ने कहा कि जब तक तिब्बत आजाद था तब भारत -तिब्बत सीमा पर थोड़े ही सैनिक ही तैनात थे और वो भी मानसरोवर का मार्ग बताने के लिए। परंतु अब तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत को रक्षा का एक तिहाई बजट सिर्फ भारत-चीन सीमा पर ही खर्च करना पड़ रहा है। अगर तिब्बत आजाद हो तो यही बजट भारत के विकास में खर्च होगा और भारत को तिब्बत में अपने धार्मिक स्थलों पर जाने का खुला अवसर मिलेगा। जबकि अब चीन ने तिब्बत पर कब्जे के बाद भारत को तंग करना जारी रखा हुआ है। उन्होंने कहा कि मंच मांग करेगा कि स्कूली शिक्षा में चीन की बजाय तिब्बत और ल्हासा की शिक्षा को शामिल किया जाए। शुक्ला ने कहा कि मंच मांग करेगा कि भारत सरकार तिब्बत को मान्यता दे और तिब्बत की नीति की भी घोषणा करे।