कोरोना वायरस में भारत में इस तरह से पांव पसारे हैं कि काम धंधा चौपट हो गया है। इंडस्ट्री ठप हो गई हैं। न ही पर्यटक आ रहे हैं और न ही ग्राहक। कोरोना का असर छतबीड़ जू में भी देखने को मिल रहा है। जू में आने वाले पर्यटकों की संख्या 20 फीसदी तक कम हो चुकी है।
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यहां की खास आकर्षण वॉकिंग एवेरी कोरोना वायरस के कारण बंद कर दी गई है। इतना ही नहीं छतबीड़ प्रबंधन को उच्चाधिकारियों की ओर से निर्देश का इंतजार है परंतु प्रबंधकों ने कोरोना वायरस से बचने के लिए एहतियात बरतना शुरू कर दिया है।
यह एहतियात छतबीड़ जू के कर्मचारियों के साथ ही यहां के जानवरों तक के लिए है। छतबीड़ में एक साथ ज्यादा भीड़ इकट्ठी न हो इसके लिए कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। इसके अलावा जगह-जगह कोरोना वायरस से बचाव के लिए निर्देश जारी किए गए हैं व हैंडवॉश और सैनिटाइजर रखवा दिया गया है।
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वॉकिंग एवेरी आते हैं करीब 4 हजार लोग
छतबीड़ की वॉकिंग एवेरी सबसे ज्यादा आकर्षक जगह है। इसमें कई प्रजातियों के पक्षियों को रखा गया है। इसमें पक्षी खुले में रहते हैं इसी वजह से कोई सीधे लोगोें के टच में न आ जाए इसकी वजह से इसे बंद कर दिया गया है। छतबीड़ जू प्रबंधन के अनुसार इसमें औसतन तीन से चार हजार लोग पहुंचते हैं।
छतबीड़ जू प्रबंधन के एक अधिकारी ने बताया कि इसमें ज्यादा लोग आते थे और उनको रोकना संभव नहीं था, इसलिए इसको बंद किया गया है। पक्षियों के लिए बनाई गई वॉकिंग एवेरी में सारस के साथ कई अन्य पक्षी हैं। इसमें एक सेल्फी प्वाइंट भी है जिसमें लोग काफी ज्यादा संख्या में इकट्ठा हो जाते हैं।
डिसइंफेक्शन प्रोटोकॉल पर जानवर
छतबीड़ जू में सभी जानवरों को अब डिसइंफेक्शन प्रोटोकॉल पर रखा जा रहा है। कोरोना वायरस की जानकारी के तुरंत बाद ही छतबीड़ जू प्रबंधकों ने डिसइंफेक्शन प्रोटोकॉल को और ज्यादा सख्त कर दिया है। इसमें अब जानवरों के रहने की जगह को हर पांच से 10 दिन के भीतर साफ करने का आदेश दिया गया है।
ताकि किसी प्रकार की कोई बीमारी न फैल सके। इसके साथ ही जहां पर लोगों के जानवरों के ज्यादा करीब जाने की संभावना है उन जगहों पर जू प्रबंधकों ने कर्मचारियों को तैनात किया है। मसलन, तेंदुआ, पैंथर के पिंजरे जालीदार हैं और कई बार पैंथर जाली के नजदीक आ जाते हैं। इसके लिए वहां कर्मचारियों को तैनात कर दिया गया है।
मास्क लगा रहे जू कर्मचारी
जू के कर्मचारियों को मास्क दिए गए हैं। सभी कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश हैं कि पब्लिक प्वाइंट पर ज्यादा भीड़ इकट्ठी न होने दें। इसके साथ ही वह अपने हाथों को सैनिटाइजर से साफ भी करते रहें ताकि कोई इंफेक्शन न हो। इसके अलावा कर्मचारी जू में आने वालों को कोरोना वायरस के बारे में जानकारी भी प्रदान करते हैं और भीड़ न लगाने की सलाह देते हैं।
हम फिलहाल छतबीड़ जू में कोरोना वायरस को लेकर एहतियात बरत रहे हैं। सभी कर्मचारियों को मास्क दे दिए गए हैं जिन्हें पहनना अनिवार्य है। इसके साथ ही हमने सैनिटाइजर और हैंडवॉश का पर्याप्त इंतजाम किया है। - एम सुधागर, डायरेक्टर छतबीड़ जू
महंगी हुई दवाएं.. 40 फीसदी धंधा चौपट
जीरकपुर। कोरोना के कहर से डेराबस्सी की फार्मा इंडस्ट्री का हाल बेहाल हो गया है। फार्मा इंडस्ट्री का ज्यादातर माल बाहर से आता था और अब बाहर से माल न आने के कारण यहां माल की कीमत दोगुनी हो चुकी है। हालात यह हैं कि एक किलो पैरासीटामोल की कीमत अब साढ़े चार सौ रुपये पर पहुंच गई है।
इसी तरह से अन्य ड्रग्स की कीमत भी बढ़ चुकी है। डेराबस्सी के फोकल प्वाइंट पर 10 फार्मूलेशन प्लांट हैं और बल्क ड्रग के पांच प्लांट हैं। ऐसी स्थिति में इन सभी का धंधा एकदम चौपट हो चुका है। अब फार्मूलेशन प्लांट के लिए मुश्किल है कि कैसे जल्द से जल्द नया माल तैयार करें और सप्लाई को बहाल रहें।
दवाओं के लिए उनको मार्केट से जो रॉ मैटेरियल मिल रहा है वह दोगुने-तीन गुने दाम पर मिल रहा है। ऐसी स्थिति में जो प्रोडक्ट तैयार हो रहा है उसमें कोई भी मार्जिन नहीं बचता। प्रोड्यूसरों की मुश्किल है कि उनको बिना किसी मार्जिन के पुराने ऑर्डरों की सप्लाई करनी पड़ रही है। इसके साथ ही यहां के मीट प्लांट पर भी कोरोना वायरस का असर पड़ा है।
डेराबस्सी के एक मीट प्लांट के मालिक ने बताया कि यहां से ज्यादातर पैक्ड मीट विदेशों में जाता था। कोरोना वायरस के कारण अब कई देशों से आने वाले ऑर्डर रद्द हो गए हैं। इसकी वजह से धंधे में 40 फीसदी गिरावट आई है।
सैनिटाइजर भी हो सकते हैं सस्ते
डेराबस्सी के फार्मा एक्सपर्ट्स के अनुसार यदि यहां की इंडस्ट्री को सैनिटाइजर और मास्क बनाने की अनुमति दे दी जाए तो इससे सैनिटाइजर के दाम भी कम हो जाएंगे। इससे लोगों को राहत मिलेगी और इंडस्ट्री भी सांस ले सकेगी। यदि सरकार मास्क और सैनिटाइजर बनाने की अनुमति दे दे तो इसका बड़ा लाभ देखने को मिलेगा। - ज्ञान प्रकाश, उद्यमी
चीने से नहीं हो रही सप्लाई
कोरोना वायरस की वजह से रॉ मैटेरियल की कीमतें दोगुना हो गई हैं। इसकी वजह माल की सप्लाई चीन से बंद होना हैं। अब जो माल आ रहा है उसकी सप्लाई तो कम है ही साथ ही उसकी कीमत भी काफी ज्यादा है।
- राकेश कुमार सिंगला, महासचिव इंडस्ट्री एसोसिएशन, डेराबस्सी
कालका। कोरोना वायरस को लेकर बढ़ रही दहशत का असर अब खाने-पीने की चीजों पर भी दिखने लगा है। हालत यह है कि जो चिकन कुछ दिन पहले तक फुटकर में 160 से 180 रुपये किलो बिकता था, वह अब 140, 120 तो कहीं 100 रुपये किलो मिल रहा है। वहीं, एक सब्जी ऐसी है, जिसके दाम आसमान पर पहुंच गए हैं। कोरोना का डर लोगों में ऐसा फैला है कि वे चिकन से दूरी बना रहे हैं। लेकिन, चिकन खाने वाले वैसा ही स्वाद पाने के लिए कभी सोया तो कभी कटहल के पीछे दौड़ रहे हैं।
इन दिनों कटहल चिकन प्रेमियों की पसंद बना हुआ है। कोरोना का चिकन से अभी तक कोई कनेक्शन नहीं है, लेकिन बावजूद लोगों में चिकन खाने को लेकर जबर्दस्त डर है। लोग अब चिकन की जगह कटहल को तरजीह दे रहे हैं। कटहल की अचानक मांग बढ़ने से इसके दाम आसमान पर हैं। हालत यह है कि कल तक जो कटहल बाजार में 40 रुपये किलो तक मिल जाता था, अब वह काटकर लेने पर 80 रुपये किलो तक बिक रहा है। दरअसल चिकन के बदले लोगों का कटहल प्रेम की एक वजह इसका नॉनवेज जैसा स्वाद है।
कालका मीट मार्केट के दुकानदार सुनील सोनकर ने बताया कि कोरोना की दहशत का मीट की दुकानों पर बुरा प्रभाव पड़ा है उन्होंने बताया कि आलम यह है कि कई दुकानों पर तो होली का बचा हुआ माल अभी तक निकल नही पाया है। बताया कि जो चिकन 160 रुपये किलो आराम से निकल जाता था, वह अब फुटकर में मजबूरन 140, 120 तो कई जगह 100 रुपये किलो के दाम पर निकालना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि इस कारोबार से जुड़े सभी दुकानदारों की ग्राहकी इस समय बुरी तरह प्रभावित हो रही है।