सुप्रीम कोर्ट की रोड सेफ्टी कमेटी के आदेश पर एक सितंबर से साइकिल पर आईएसओ मानक के तहत दस रिफ्लेक्टर लगाए जाएंगे। इससे साइकिल सौ रुपये महंगी हो जाएगी। फिलहाल उद्यमियों ने चीन से इन रिफ्लेक्टरों का आयात किया है। घरेलू बाजार में रिफ्लेक्टर बनाने में छह माह का वक्त लग जाएगा, तब तक उद्योग को आयात पर निर्भर रहना होगा।
उद्यमियों को चिंता है कि इससे संगठित और असंगठित क्षेत्र में साइकिल की कीमत का गैप करीब दो सौ रुपये हो जाएगा, इसका मुकाबला करना साइकिल निर्माताओं को मुश्किल लग रहा है। उद्योग ने सरकार से गुहार लगाई है कि रिफ्लेक्टर लगाने की समय सीमा को एक साल के लिए बढ़ाया जाए, तब तक आसानी से लोकल स्तर पर रिफ्लेक्टर का उत्पादन शुरू कर लिया जाएगा।
रोड सेफ्टी कमेटी ने एक सितंबर से साइकिल पर दस रिफ्लेक्टर लगाना अनिवार्य किया है। इसका मुख्य कारण साइकिल से होने वाली दुर्घटनाओं को कम करना है। जो रिफ्लेक्टर मंजूर किए गए हैं उनका उत्पादन केवल चीन में हो रहा है। ऐसे में साइकिल उद्योग केवल चीन पर ही निर्भर है। देश में रोजाना करीब पचास हजार साइकिल बन रही हैं, इनके लिए रोजाना पांच लाख रिफ्लेक्टरों की मांग रहेगी।
जी-13 बाईसाइकिल फोरम के संयोजक यूके नारंग का कहना है कि टेंडरों के जरिए साइकिल की खरीद कर रहे विभिन्न राज्यों ने भी रिफ्लेक्टर अनिवार्य कर दिया है। उद्योग के पास अभी 32 लाख साइकिल का आर्डर है, जबकि 11 लाख साइकिल का आर्डर अगले माह तक आने की उम्मीद है।
नारंग ने कहा कि दस रिफ्लेक्टर लगाने से प्रति साइकिल का दाम करीब सौ रुपये बढ़ जाएगा। उन्होंने कहा कि एक्साइज ड्यूटी, वैट और रिफ्लेक्टर के चलते संगठित एवं असंगठित क्षेत्र में प्रति साइकिल गैप 200 रुपये तक हो जाएगा।
इंडियन बाईसाइकिल मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रधान आरडी शर्मा का कहना है कि छोटे साइकिल निर्माता सीधे आयात नहीं कर सकते। उनके लिए समस्या खड़ी हो सकती है। दूसरे जब तक घरेलू स्तर पर उत्पादन शुरू नहीं होता, तब तक रिफ्लेक्टर अनिवार्य न किया जाए।
नोवा साइकिल्स के एमडी हरमोहिंदर सिंह पाहवा और विशाल साइकिल्स के एमडी संजय महेंद्रू कहते हैं कि हालांकि इंडस्ट्री ने चीन से रिफ्लेक्टर आयात कर लिए हैं, लेकिन लंबी अवधि के लिए घरेलू स्तर पर तकनीक लाना जरूरी है। इसके लिए सरकार उद्योग को उचित वक्त दे।