केंद्र और राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों के चक्रव्यूह में उलझे सूबे के ईंट भट्ठा उद्योग के समक्ष अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है।
हालत यह है कि पेचीदगियों के चलते उद्यमियों को पर्यावरण क्लीयरेंस नहीं मिल पा रहा है, सूबे में रेत बजरी संकट के कारण ईंट की मांग में पचास फीसदी की गिरावट दर्ज की जा रही है। नतीजतन पिछले साल के 6000 रुपये के मुकाबले ईंट का दाम 3500-4500 रुपये प्रति हजार चल रहा है। इससे इंडस्ट्री की लागत भी नहीं निकल पा रही है।
पंजाब ईंट भट्ठा मालिक एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि एनवायर्नमेंट क्लीयरेंस के बजाय अन्य राज्यों की तर्ज पर साधारण परमिट पर ही उद्यमियों को ईंट के लिए मिट्टी खोदने की इजाजत दी जाए। दूसरे कारोबार में कमी के अनुपात में वैट का बोझ कम किया जाए। कोयले पर एडवांस टैक्स का एडजस्टमेंट वैट में किया जाए, खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म की जाए, तभी इंडस्ट्री में जान आ सकेगी।
एसोसिएशन के स्टेट प्रेसिडेंट कुलदीप सिंह मक्कड़ का कहना है कि सूबा सरकार ने नियम बना कर साधारण परमिट पर मिट्टी निकालने की इजाजत दे दी थी, लेकिन केंद्र ने फिर से अड़ंगा लगा दिया है। अब पर्यावरण क्लीयरेंस के लिए कुछ उद्यमियों ने आवेदन कर रखा है, एक उसमें वक्त काफी लग रहा है, दूसरे सभी उद्यमियों के लिए शर्तें पूरी करना नामुमकिन है। यदि सरकार ने शीघ्र राहत न दी तो राज्य की इंडस्ट्री बंदी के कगार पर पहुंच जाएगी।
मक्कड़ ने कहा है कि सूबा सरकार ने पहले एकमुश्त वैट दो लाख तय किया था और सालाना आठ फीसदी की बढ़त तय की थी, लेकिन एकमुश्त को बढ़ा कर दो से चार लाख कर दिया गया और बढ़त की शर्त भी नहीं हटाई। इसके अलावा कुछ जिलों में उद्यमियों को कोयले पर दिए एडवांस टैक्स का एडजस्टमेंट भी नहीं दिया जा रहा है।
नतीजतन टैक्स का बोझ काफी बढ़ गया है। उधर निर्माण में सुस्ती के कारण ईंट की मांग आधी रह गई है। कोयला, लेबर, मिट्टी और तमाम इनपुट लागत बढ़ गई है, लेकिन दाम पिछले साल से भी कम मिल रहे हैं। इससे उद्यमी आर्थिक संकट में फंस रहे हैं। इन हालात में भट्ठे चलाना मुश्किल हो रहा है और उद्यमियों ने बेचैनी व्याप्त है।