जन ज्ञान विज्ञान जत्थे ने पंजाब में धान की पराली जलाने से हो रहे वायु प्रदूषण पर चिंता जताई है। जत्थे का तर्क है कि आसमान में छाए धुएं के कारण लोगों में नाक, सांस और फेफड़ों के रोग होने की संभावना है। जत्थे के महासचिव डॉ. अरुण मित्रा का कहना है कि 12 अक्तूबर 1998 को इस तरह का धुआं पूरे पंजाब के आसमान में फैल गया था। इसने तब काफी गंभीर स्थिति पैदा कर दी थी, लेकिन इससे कोई सबक नहीं सीखा गया। धान की पराली जलाने से कई उपजाऊ तत्व तबाह हो जाते हैं। इससे एक लाख टन से अधिक नाइट्रोजन नष्ट होती है, इससे ही सौ करोड़ रुपये का नुकसान होता है। दूसरी तरफ पराली को जमीन में दबाकर इसे खाद के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है। जत्थे ने मांग की है कि मानव और जमीन की बेहतरी के लिए पराली जलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।