राज्य में नौ साल के बच्चे भी नशे की लत में फंस चुके हैं। हर महीने चार से पांच बच्चों के परिजन उन्हें जिले के अलग-अलग नशा छुड़ाओ केंद्र और मनोवैज्ञानिक क्लीनिकों पर ला रहे हैं। हैरानी की बात है कि ये बच्चे हेेरोइन, सफेद पाउडर, स्मैक, चरस जैसे नशे करने के आदी हैं।
सारे मामलों में एक जैसी बात है कि ज्यादातर बच्चों को नशा सप्लाई करने वालों ने ही नशे के दल-दल में फंसाया है। ये पहले बच्चों को नशा सप्लाई करने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। यहीं से उन्हें नशे की लत लग जाती है।
लुधियाना सिविल अस्पताल और रेडक्रॉस की ओर से बनाए गए नशा छुड़ाओ केंद्र में ऐसे दो नए केस सामने आए हैं। सिविल अस्पताल के नशा छुड़ाओ केंद्र में आए नौ साल के बच्चे ने खुलासा किया कि उसे चरस और फ्लूड का नशा करने की आदत उसके कुछ दोस्तों ने ही लगा दी थी।
पहले उसकी उम्र से बड़े दोस्त उसे कहीं न कहीं साथ ले जाते थे। वहां उसे चरस और फ्लूड का नशा करवा देते थे। इसके बाद वह नशे का आदी हो गया और खुद ही नशा करने लगा। कुछ दिन बाद उसके परिजनों को शक हुआ तो फिर उसके नशा करने का पता चलने पर सिविल अस्पताल दाखिल कराया।
इसी तरह कुछ समय पहले जालंधर में भी 12 साल के एक बच्चे को नशा छुड़ाओ केंद्र में दाखिल कराया गया था। यह बच्चा चाय की दुकान पर काम करता था। बच्चे के सामने कुछ लोग हेरोइन का नशा करते थे। फिर उन्होंने बच्चे को कभी-कभी नशे की पुड़िया देकर सप्लाई करवाना शुरू कर दिया। बाद में उसे भी नशे की लत लग गई।
सिविल अस्पताल के डॉक्टर विवेक गोयल ने कहा कि बच्चों के नशे के मामले का सिविल अस्पताल में उनकी ड्यूटी के दौरान मामला सामने आया है।
मेरी क्लीनिक में हर महीने पूरे राज्य के अलग-अलग शहरों से औसतन चार परिजन नशे की लत छुड़ाने के लिए बच्चों को लेकर आते हैं। सारे ही केसों में यह बात सामने आई है कि नशे के सप्लायर ही इन बच्चों को नशे की दल दल में दाखिल कर रहे हैं।
-डॉ. राजीव गुप्ता, मनोचिकित्सक