संवाद न्यूज एजेंसी
लुधियाना। देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) सेक्टर में सूक्ष्म इकाइयों की संख्या 6 करोड़ 56 लाख 73 हजार 436 है जबकि लघु इकाइयां 4 लाख 77 हजार 455 और मध्यम उद्योग मात्र 35 हजार 760 हैं। यानी कुल एमएसएमई में सूक्ष्म इकाइयों की हिस्सेदारी 99.77 प्रतिशत है। बावजूद इसके सरकार की लगातार बदलती परिभाषाओं का सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ा है। वर्ल्ड एमएसएमई फोरम का मानना है कि यदि सरकार ने सूक्षम उद्योगों की सुध न ली तो यह सेक्टर प्रतिस्पर्धा से आउट हो जाएगा और इसके समक्ष आस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। इस संबंध में फोरम ने तथ्यों के साथ पीएम नरेंद्र मोदी को अपनी चिंताओं से भी अवगत कराया है।
उद्यमी कहते हैं कि जून 2020 तक सूक्ष्म इकाइयों के लिए प्लांट और मशीनरी की सीमा 25 लाख रुपये थी। लघु इकाइयों के लिए यह सीमा 5 करोड़ और मध्यम के लिए 10 करोड़ तय थी लेकिन जुलाई 2020 में इसे संशोधित कर सूक्ष्म उद्योग की सीमा एक करोड़ और टर्नओवर पांच करोड़ कर दी गई। लघु उद्योग के लिए यह सीमा 10 करोड़ और 50 करोड़, वहीं मध्यम उद्योग के लिए 50 करोड़ और 250 करोड़ कर दी गई। सरकार यहीं नहीं रुकी। वर्ष 2025 से इसे एक बार फिर बदलकर सूक्ष्म इकाइयों की सीमा 2.5 करोड़ और टर्नओवर 10 करोड़, लघु इकाइयों की सीमा 25 करोड़ और टर्नओवर 100 करोड़ तथा मध्यम इकाइयों की सीमा 125 करोड़ और टर्नओवर 500 करोड़ कर दी गई। इस तरह पांच साल में परिभाषा 10 गुना तक बढ़ा दी गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार ने यूरोप और इंग्लैंड के बराबर की परिभाषा अपना ली जबकि वहां की मुद्रा भारत की तुलना में 100 गुना मजबूत है। यूरोप में जहां सूक्ष्म उद्योग का टर्नओवर करीब 20 करोड़ रुपये माना जाता है वहीं छोटे उद्योग 100 करोड़ और मध्यम 500 करोड़ तक की सीमा में आते हैं। आलोचकों का आरोप है कि इस बदलाव के जरिये भारत की एमएसएमई को विकसित देशों के बराबर दिखाने की कोशिश की गई लेकिन असल में इसका खामियाजा सूक्ष्म इकाइयों को ही उठाना पड़ रहा है।
निर्यात में भी पिछड़े सूक्ष्म उद्योग
आंकड़े बताते हैं कि देश की 6.57 करोड़ सूक्ष्म इकाइयां केवल 29,876 करोड़ रुपये का निर्यात कर रही हैं। इसके मुकाबले 4.77 लाख लघु उद्योग 45,087 करोड़ और 35,760 मध्यम उद्योग 50,562 करोड़ रुपये का निर्यात कर रहे हैं। औसतन देखें तो एक सूक्ष्म इकाई का निर्यात मात्र 4,547 रुपये है, जबकि एक मध्यम उद्योग का निर्यात 1.41 करोड़ रुपये है।
एनपीए में भी असमानता
बैंक ऋण वितरण में भी सूक्ष्म उद्योग उपेक्षित हैं। कुल एमएसएमई ऋण का केवल 20 फीसदी हिस्सा इन्हें मिल रहा है। देश की 6.57 करोड़ सूक्ष्म इकाइयों का एनपीए 52,519 करोड़ रुपये है, यानी प्रति इकाई औसतन 7,993 रुपये। वहीं लघु उद्योगों का एनपीए 19,677 करोड़ रुपये (प्रति इकाई 4.12 लाख रुपये) और मध्यम उद्योगों का एनपीए 8,553 करोड़ रुपये (प्रति इकाई 23.92 लाख रुपये) है।
रोजगार का बड़ा
आधार, फिर भी उपेक्षा
फोरम के प्रधान बदीश जिंदल कहते हैं कि एमएसएमई क्षेत्र 18.36 करोड़ लोगों को रोजगार दे रहा है, जिसमें से 16.3 करोड़ नौकरियां केवल सूक्ष्म क्षेत्र से हैं। कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र होने के बावजूद इसे वित्तीय संस्थानों और सरकारी खरीद एजेंसियों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। सरकारी खरीद का 90 प्रतिशत लाभ भी महज 0.3 प्रतिशत सूक्ष्म और लघु इकाइयों तक सीमित है।
कॉरपोरेट से बढ़ी मुश्किलें
बड़े कॉरपोरेट घरानों के खुदरा क्षेत्र में उतरने से सूक्ष्म उद्योगों की बिक्री लगातार घट रही है। बड़ी और मध्यम इकाइयां कच्चा माल थोक में सस्ता खरीद लेती हैं, जिससे उनका उत्पादन लागत कम आता है और बाजार में प्रतिस्पर्धा में सूक्ष्म उद्योग पिछड़ जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ने सूक्ष्म उद्योगों के लिए अलग मंत्रालय नहीं बनाया और ठोस कदम नहीं उठाए, तो अगले दो वर्षों में देशभर में एक करोड़ सूक्ष्म इकाइयां बंद हो सकती हैं। यह स्थिति न केवल करोड़ों रोजगार छीन लेगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगी। सरकार खुद को छोटे उद्योगों का हितैषी बताती है, लेकिन अब उसकी असली परीक्षा यही है कि वह करोड़ों सूक्ष्म इकाइयों को बचाने के लिए कितनी गंभीरता दिखाती है।