1947 में इबादत बंद होने के कारण मस्जिद की छोटी ईंटों की दीवारें और गुंबदों की मीनाकारी टूट चुकी थी। गांव के सिख दंपती निरमल सिंह और उनकी पत्नी कमलजीत कौर ने इसका रखरखाव किया।
सूखाणा गांव की ऐतिहासिक जामा मस्जिद अब फिर से आबाद हो गई है। यह 1947 के विभाजन के बाद 78 वर्षों तक वीरान और खंडहर हालत में रही।
विज्ञापन
1947 में इबादत बंद होने के कारण मस्जिद की छोटी ईंटों की दीवारें और गुंबदों की मीनाकारी टूट चुकी थी। यदि गांव के सिख दंपती निरमल सिंह और उनकी पत्नी कमलजीत कौर ने समय-समय पर सफाई और रखरखाव नहीं किया होता तो इस ऐतिहासिक धरोहर का नामो-निशान मिट चुका होता।
रायकोट और नूरपुरा गांवों के मुस्लिम समुदाय के सहयोग और करीफ फुकरान अहमद अहमदगढ़ वालों के अथक प्रयास से मस्जिद पुनर्स्थापित की गई। इस ऐतिहासिक अवसर पर ग्राम पंचायत और मस्जिद प्रबंधक कमेटी ने विशेष धार्मिक समारोह का आयोजन किया। पंजाब के शाही इमाम हजरत मौलाना मुहम्मद उस्मान लुधियानवी, विधायक हाकम सिंह ठेकेदार और पंजाब वक्फ बोर्ड के सीनियर सदस्य एडवोकेट अब्दुल कादिर विशेष रूप से उपस्थित रहे।
मस्जिद की जिम्मेदारी लंबे समय तक निभाने वाले निरमल सिंह और कमलजीत कौर को मुस्लिम समुदाय ने सम्मानित किया। शाही इमाम ने कहा कि धर्म मानवता को जोड़ने का काम करता है और जो लोग धर्मों में फूट डालते हैं वे दोनों के गद्दार हैं। उन्होंने इस सिख दंपती के योगदान को भाईचारे और सहिष्णुता का उदाहरण बताया।
भाईचारे को अपनाने की अपील
कार्यक्रम में मदरसा बस्सियां के मौलवी मुहम्मद मुरसलीन ने मंच सचिव की भूमिका निभाई। इस अवसर पर कारी मोहम्मद सादिक यजदानी, हाफिज मोहम्मद अशरफ, बब्बू खान रायकोट, सरपंच मनजीत सिंह, पूर्व सरपंच उजागर सिंह, पंच सुखदेव सिंह सहित दर्जनों मुस्लिम और सिख नेताओं ने भाग लिया। वक्ताओं ने सभी से धर्म के प्रति परिपक्वता और भाईचारे को अपनाने की अपील की।