केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने उम्मीद जताई है कि पंजाब के लोगों ने जिस ढंग से पवित्र काली बेई को संत बलबीर सिंह सीचेवाल की अध्यक्षता में कार सेवा के जरिए साफ किया है, ठीक उसी आधार पर गंगा को प्रदूषण मुक्त किया जा सकता है।
गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के बारे में केंद्रीय मंत्रियों की दिल्ली में 7, 8 और 9 जुलाई को हुई बैठक में श्री गुरु नानक देव जी के चरणस्पर्श प्राप्त पवित्र काली बेई की भी खूब चर्चा हुई। दिल्ली के विज्ञान भवन में गंगा मंथन बैठक में बाबा नानक की पवित्र काली बेई को प्रदूषण से निजात दिलाने वाले कारसेवकों और कारसेवा की चर्चा की गई। यह जानकारी बैठक में हिस्सा लेकर लौटे बाबा सुखजीत सिंह सीचेवाल ने दी।
उन्होंने बताया कि बैठक में चर्चा हुई कि काली बेई की कार सेवा ने देश के अन्य दरियाओं को प्रदूषण मुक्त रखने का जो मॉडल पेश किया है, उसके आधार पर ही सभी दरिया साफ रखे जा सकते हैं। मंथन में हिस्सा लेने आए संतों ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए बनी एनजीओ को व्यापार की दुकान बताया। देश के दरियाओं को बचाने के बारे में एक्ट बनाने का काम केंद्रीय मंत्री को सौंपा गया है। संत समाज ने आशा जताई कि उन्हें मोदी सरकार से गंगा को बचाने की उम्मीद है।
बाबा सुखजीत ने बताया कि गंगा मंथन पर केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने संत बलबीर सिंह सीचेवाल को बुलाया था, लेकिन वह विदेश गए हुए हैं। उन्होंने बताया कि गंगामंथन में देश के मलिन हो रहे दरियाओं के बारे में गंभीरता से मुद्दों को उभारा गया। बैठक में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, गंगा बचाओ और दरियाओं के विकास संबंधी मंत्रालय की मंत्री उमा भारती, पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर समेत संत समाज, समाजसेवी जत्थेबंदियां, वातावरण प्रेमियों और संबंधित अफसर मौजूद थे।
बाबा सुखजीत सिंह सीचेवाल के मुताबिक बैठक में केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने कहा कि गंगा में बढ़ रहे फैक्टरियों और शहर के प्रदूषण को ले कर जहां पूरा देश चिंतित था। संत सुखजीत सिंह ने 1974 का वाटर एक्ट लागू करने की मांग की। इस विचार चर्चा में जैन, ईसाई, सिख और हिंदू धार्मिक नेताओं ने भी हिस्सा लिया। संत समाज का कहना था कि गंगा को किसी धर्म विशेष से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।
पहले काली अब पवित्र बेईं
काली बेईं होशियारपुर जिले की तहसील मुकेरियां के गांव टेरिकियाना से निकलती है और जिला कपूरथला के भुलत्थ, कांजली से होते हुए सुल्तानपुर लोधी के नजदीक से बहते हुए गांव भरोआणा और शेखमंगा के पास से होकर दरिया ब्यास में जा मिलती है। पूर्व में इसे काली बेईं के नाम से ही पुकारा जाता था, परंतु श्री गुरु नानक देव जी के नाम के साथ जुड़ जाने से इसे पवित्र बेईं के नाम से भी पुकारा जाने लगा।
जुलाई 2000 में शुरू हुई थी कारसेवा
इस पवित्र बेईं को प्रदूषण मुक्त कराने का बीड़ा उठाने वाले संत सीचेवाल ने अपने 50 अनुयायियों के साथ 16 जुलाई 2000 को जिस पुनीत कार्य के लिए कारसेवा का आह्वान किया, उसे उन्होंने बाबे दी नदी के काम का नाम दिया। संत की कारसेवा की चर्चा राष्ट्रपति भवन से लेकर टाइम मैगजीन तक हो चुकी है। संत सीचेवाल के आह्वान पर कारसेवकों की संख्या बढ़ती गई और धीरे धीरे इसने काफिले का रूप ले लिया।
हाथों और ट्रैक्टरों से निकाल दी थी जलकुंभी
गंदगी और सांपों से भरे पानी में बेखौफ उतरकर स्वयंसेवकों ने सैकड़ों टन जलकुंभी अपने हाथों से निकाल दी। बेईं को गहरा व चौड़ा करने के लिए नदी से गाद निकाली गई। इस काम के लिए किसानों ने अपने हजारों ट्रैक्टर लगा दिए। संत सीचेवाल खतरनाक स्थानों में स्वयं ट्रैक्टर चलाकर दूसरे सेवकों के लिए प्रेरणादायी बनते रहे। सफाई का यह काम करने में उन्हें एक साल से भी कम समय लगा। लगभग 165 किलोमीटर लंबी काली बेईं की कारसेवा के जरिए साफ करवाने के बाद उसके किनारे घाटों के निर्माण का कार्य शुरू हुआ।