जालंधर। ब्रिटेन सरकार ने खालिस्तान समर्थक गुरप्रीत सिंह रेहल को किसी भी कंपनी का निदेशक बनने या उसके प्रबंधन में भाग लेने से रोक दिया है। यह कदम भारत सरकार के दबाव के बाद उठाया गया। ब्रिटेन ने चेतावनी दी है कि प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर सात साल तक की जेल या दस लाख पाउंड तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
खालिस्तानी फंडिंग और भर्ती का आरोप
रेहल पर आरोप है कि वह भारत में सक्रिय आतंकवादी संगठनों की फंडिंग, युवाओं की भर्ती, प्रचार और हथियारों की खरीद में शामिल रहा है। ब्रिटिश वित्त मंत्रालय ने बताया कि यह पहली बार है जब घरेलू काउंटर टेररिज्म कानून का इस्तेमाल खालिस्तानी आतंकी संगठनों की फंडिंग रोकने के लिए किया गया है। बब्बर खालसा संगठन 1980 के दशक से भारत में कई आतंकी हमलों में सक्रिय रहा है और इसके समर्थक यूके में वित्तीय और प्रचार संबंधी गतिविधियों में लगे रहे हैं।
यूके में बढ़ती सुरक्षा चुनौतियां
इस साल 19 मार्च को खालिस्तान समर्थक प्रदर्शनकारियों ने ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग में घुसने का प्रयास किया, भारतीय ध्वज को उतारा और नारे लगाए। भारत ने ब्रिटेन सरकार को सुरक्षा में लापरवाही पर कड़ी आपत्ति जताई। मार्च 2025 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की यात्रा के दौरान भी सुरक्षा उल्लंघन हुआ था।
अंतरराष्ट्रीय सिख यूथ फेडरेशन का सक्रिय नेटवर्क
यूके में आईएसवाईएफ जैसे समूह सक्रिय हैं। इससे जुड़े जगतार सिंह जोहल (जग्गी) को पंजाब में हिंदू नेताओं की हत्या के आरोप में जेल में रखा गया है। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी वित्तीय प्रणाली का दुरुपयोग करने वालों को किसी भी कीमत पर नहीं बख्शेगा और शांतिप्रिय समुदायों के समर्थन में यह कदम उठाया गया है। ब्रिटेन की कार्रवाई भारत-यूके संबंधों में सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। यूके के इस कदम से खालिस्तानी नेटवर्क को बड़ा झटका लगा है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चरमपंथ विरोधी प्रयासों को गति मिली है।