प्रसिद्ध मूर्तिकार शिव सिंह (77) ने दशकों पहले अपने पैतृक गांव बस्सी
गुलाम हुसैन को छोड़ दिया था, लेकिन अपने गांव के लिए उनके दिल में लगाव
अंत तक बना रहा। वे कहते थे कि मैं अपनी मूर्तियों में अपने गांव को जी
लेता हूं। गांव से कोई भी, किसी भी उम्र का हो, उनसे मिलता तो वे उसका दिल
से स्वागत करते थे। गांव के लोग उनके निधन की सूचना से सदमे में हैं। शिव
सिंह के पिता गांव बस्सी गुलाम हुसैन में खेती करते थे और करीब 35 एकड़
जमीन के स्वामी थे।
गांव के बुजुर्ग बलदेव सिंह बताते हैं कि शिव सिंह
ने गांव के स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई की और फिर वह होशियारपुर में
डीएवी हायर सेकेंडरी स्कूल में भर्ती हो गए जहां से उन्होंने मैट्रिक की।
शिव फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना ध्यान
चित्रकला और मूर्तिकला की तरफ लगाया। उन्होंने गांव के चो के तट की रेत को
मूर्तियां और चित्र बनाने के लिए इस्तेमाल किया। वहां उन्होंने तरंगों का
जीवंत चित्रण और किनारों पर तरंगों का प्रभाव चित्रित किया।
चंडीगढ़
कॉलेज से बतौर प्रोफेसर रिटायर होने के बाद वह पंचकूला में रहने लगे, लेकिन
गांव के साथ अपने संबंध को समाप्त नहीं किया। गांव का एक युवक समीर सैनी
कुछ साल पहले पंचकूला में उनसे मिलने गया तो उन्होंने लंबे समय तक गांव के
लोगों के बारे में बातें की। समीर ने बताया कि शिव सिंह ने कहा कि वह अपनों
को कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने कहा कि जब उन्हें पंजाबी यूनिवर्सिटी
कैंपस के लिए एक मूर्ति बनाने के लिए कहा गया था, तो उनके विचार गांव जा
पहुंचे। पंजाबी विश्वविद्यालय में बनाई गई मूर्तिकला गांव के स्कूल के पास
खड़े पुराने बरगद के पेड़ का ही एक अवतार थी।
शिव सिंह के हाथों में चमत्कार था
मिलेनियम
हॉल ऑफ फेम पुरस्कार प्राप्त कलाकार जसपाल एस ने बताया कि कुछ समय पहले वह
शिव सिंह के साथ एक कार्यशाला में थे। उनसे सीखना मानो सीधे प्रकृति से ही
सीखना था। वह हर चीज में जान डाल सकते थे और एक मृत धातु में में भी वह
प्रकृति को उतार लाते थे। उनके हाथ में ऐसा चमत्कार था कि वह हर चीज में
प्रकृति के रंग भरकर उसमें जान डाल देते थे। उनके निधन से कला जगत को न भरा
जाने वाला शून्य सदैव सालता रहेगा।