पंजाब के नए सरदार परगट सिंह के सामने गुटबाजी से ऊपर सियासी जमीन मजबूत करने की चुनौती होगी। केपी के बाद लंबे अंतराल में दोआबा को पंजाब कांग्रेस की कमान फिर मिली है। परगट के जरिए गुटों से ऊपर संगठन खड़ा करने की चुनौती है।
पंजाब की 2027 की सियासी जंग में कांग्रेस ने अपना कप्तान दोआबा से चुना है। जालंधर कैंट से विधायक और पूर्व हॉकी कप्तान परगट सिंह को पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है।
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उन्होंने राजा वड़िंग की जगह ली है, जिन्होंने राहुल गांधी से मुलाकात के बाद प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। परगट के सामने गुटबाजी से ऊपर सियासी जमीन मजबूत करने की बड़ी चुनौती रहेगी।
कांग्रेस ने ऐसे समय में दोआबा के चेहरे पर दांव लगाया है, जब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है और पार्टी के भीतर लंबे समय से गुटबाजी खींचतान चर्चा में रही है। हाईकमान की कोशिश अलग-अलग खेमों के बीच स्वीकार्य चेहरा सामने लाने की भी मानी जा रही है।
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दोआबा को करीब डेढ़ दशक बाद फिर प्रदेश कांग्रेस की कमान मिली है। इससे पहले महिंदर सिंह केपी 14 फरवरी 2008 से 12 जनवरी 2010 तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे।
उनके बाद इस पद पर कैप्टन अमरिंदर सिंह, प्रताप सिंह बाजवा, सुनील जाखड़, नवजोत सिंह सिद्धू और राजा वड़िंग जैसे नेता रहे। राजनीतिक तौर पर इसका दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मालवा सबसे बड़ा चुनावी क्षेत्र
पंजाब की चुनावी राजनीति में मालवा सबसे बड़ा चुनावी क्षेत्र है और कांग्रेस को 2027 की लड़ाई में यहां अपनी जमीन मजबूत करनी होगी। ऐसे में संगठन की कमान दोआबा के नेता को सौंपना क्षेत्रीय संतुलन का संकेत भी है।
परगट की जालंधर कैंट की राजनीति, पूर्व मंत्री का अनुभव और हॉकी के मैदान से बनी पहचान उन्हें पारंपरिक गुटीय राजनीति से अलग सार्वजनिक पहचान देती है। अब असली चुनौती चन्नी, बाजवा, वड़िंग, रंधावा समेत वरिष्ठ नेताओं को एक चुनावी रणनीति पर साथ लाने की है।
टिकट की राजनीति में संतुलन बनाने की भी परीक्षा होगी
परगट के सामने सिर्फ सरकार के खिलाफ विपक्षी अभियान खड़ा करने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि जिला और ब्लॉक स्तर तक संगठन को सक्रिय करने और टिकट की राजनीति में संतुलन बनाने की भी परीक्षा होगी। अब देखना होगा कि परगट इस कमान को गुटीय खींचतान से ऊपर उठाकर चुनावी संगठन में कितना बदल पाते हैं।