हिंदी भाषा पंजाब में खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है। विद्यार्थी हिंदी
भाषा में अपना भविष्य बनाना नहीं चाह रहे हैं। सरकार की ओर से भी हिंदी के
प्रचार प्रसार के लिए कोई खास यत्न नहीं किए जा रहे हैं।
राज्य में पंजाबी
भाषा में एमए करने वालों के मुकाबले हिंदी भाषा में मास्टर डिग्री करने
वालों की संख्या 30 प्रतिशत तक कम है। हिंदी भाषा को सबसे ज्यादा नुकसान इस
बात से हो रहा है कि राज्य में रोजगार कोर्स के लिए हिंदी विषय को विकल्प
विषय के रूप में रख दिया है। विद्यार्थियों को यह सुविधा दे दी गई है कि वे
हिंदी के बदले किसी अन्य विषय को चुन सकते हैं।
डीएवी कॉलेज के
हिंदी लेक्चरर बलविंदर सिंह के अनुसार पंजाब में हिंदी को खत्म करने के
प्रयत्न किए जा रहे हैं। उनका कहना है कि हिंदी भाषा के सिलेबस को बीते 6-7
साल से अपडेट ही नहीं किया गया है। वहीं पंजाबी और अंग्रेजी भाषा का
सिलेबस कई बार बदला जा चुका है। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा के सिलेबस को
बदलकर 21वीं सदी के अनुसार अपडेट किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि
डीएवी कॉलेज में हिंदी में एमए करने वालों की संख्या केवल 24 से 25
विद्यार्थियों तक ही सीमित होकर रह गई है। हिंदी के सिलेबस को अपडेट करने,
इसमें विज्ञापन लेखन, न्यूज लेखन, बैंकिंग का सिलेबस हिंदी में आना चाहिए।
सरकार ने हिंदी के प्रचार में कुछ नहीं किया : साहनी
हिंदी
के प्रोेफेसर कश्मीरी लाल साहनी का कहना है कि 1985 में जब हिंदी को
विकल्प भाषा के रूप में कर दिया गया था, तभी से हिंदी के प्रचार प्रसार में
कमी आ गई थी। इसके बाद जितनी भी सरकारें आईं किसी ने भी हिंदी के प्रचार
के लिए कुछ नहीं किया है।
वोकेशनल कोर्स की ओर बढ़ा बच्चों का ध्यान : बल्ल
एचएमवी
में हिंदी प्रोफेसर डॉ. निधि बल्ल का कहना है कि इस समय बच्चों का ज्यादा
ध्यान वोकेशनल कोर्स की तरफ हो गया है। पहले अगर सौ बच्चों को माता-पिता
पूछते थे कि वे क्या बनना चाहते हैं तो उसमें से 80 बच्चे कहते थे कि हम
टीचर बनना चाहते हैं। लेकिन आज के समय में 100 में से 10 बच्चे भी नहीं
कहते कि उनको टीचर बनना है। इसका बड़ा कारण टीचर लाइन में विद्यार्थियों को
बेहतर स्कोप नजर नहीं आ रहा है।