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कनिष्क बम विस्फोट त्रासदी: 41 साल बाद कनाडा का कबूलनामा, फिर भी सक्रिय हैं खालिस्तानी नेटवर्क

Sat, 27 Jun 2026 09:41 AM IST
Nivedita सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)

सार

23 जून 1985 को एयर इंडिया की फ्लाइट-182 कनिष्क आयरलैंड के तट के पास हवा में बम विस्फोट का शिकार हुई थी। इस आतंकी हमले में 329 लोगों की मौत हुई थी जिनमें अधिकतर भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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एयर इंडिया की फ्लाइट-182 (कनिष्क) बम विस्फोट त्रासदी के 41 वर्ष बाद कनाडा की सुरक्षा एजेंसियों के बदले रुख ने भारत-कनाडा संबंधों में नई बहस छेड़ दी है। 
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भारत लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि कनाडा में खालिस्तानी चरमपंथियों को राजनीतिक संरक्षण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वोट बैंक की राजनीति के कारण खुलकर गतिविधियां चलाने का अवसर मिला। अब 2026 में कनाडा की सुरक्षा और वित्तीय एजेंसियों की सार्वजनिक रिपोर्टों में पहली बार स्वीकार किया गया है कि खालिस्तानी चरमपंथ से जुड़े कुछ नेटवर्क कनाडा की राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए भी खतरा बन रहे हैं।

23 जून 1985 को एयर इंडिया की फ्लाइट-182 कनिष्क आयरलैंड के तट के पास हवा में बम विस्फोट का शिकार हुई थी। इस आतंकी हमले में 329 लोगों की मौत हुई थी जिनमें अधिकतर भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे। उसी दिन जापान के नारिता एयरपोर्ट पर एयर इंडिया के एक अन्य विमान के लिए भेजे गए सामान में हुए विस्फोट में दो बैगेज हैंडलरों की भी जान गई थी।
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जांच एजेंसियों के अनुसार यह हमला ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बदले की भावना से रचा गया था। जांच में बब्बर खालसा इंटरनेशनल के प्रमुख तलविंदर सिंह परमार को इसका मास्टरमाइंड माना गया। भारत ने 1981 में उसके प्रत्यर्पण की मांग की थी लेकिन कनाडा ने उसे स्वीकार नहीं किया। बाद में 1992 में पंजाब पुलिस ने फिल्लौर के पास मुठभेड़ में उसे मार गिराया। इस मामले में कनाडा में केवल इंद्रजीत सिंह रियात को बम बनाने में मदद का दोषी ठहराया गया जबकि अन्य प्रमुख आरोपी सबूतों के अभाव में बरी हो गए।

भारत लगातार आरोप लगाता रहा है कि कनाडा में कुछ खालिस्तानी संगठन गुरुद्वारों और सामाजिक संस्थाओं का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों, आतंकी फंडिंग और अलगाववादी प्रचार के लिए करते रहे। भारत का कहना रहा कि कनाडा ने इन गतिविधियों पर अपेक्षित सख्ती नहीं दिखाई।

2026 की रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि कुछ चरमपंथी नेटवर्क डर और दबाव के जरिए धन जुटाने तथा गतिविधियों को वित्तीय सहायता देने की कोशिश कर रहे हैं। वित्तीय निगरानी रिपोर्टों में बब्बर खालसा इंटरनेशनल और इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन से जुड़े संदिग्ध वित्तीय नेटवर्क पर भी चिंता जताई गई है।

भारतीय एजेंसियों के अनुसार कई वांछित खालिस्तानी समर्थक और गैंगस्टर कनाडा में रह चुके हैं या वहीं से गतिविधियां संचालित करने के आरोपों का सामना कर रहे हैं। इनमें अर्श डल्ला, लखबीर सिंह लांडा और गुरजीत सिंह चीमा जैसे नाम शामिल हैं। भारत इन पर आतंकवाद, टारगेट किलिंग, हथियारों की तस्करी और जबरन वसूली जैसे आरोप लगाता रहा है। भारत का कहना है कि जब तक ऐसे नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं होते और वांछित आरोपियों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती तब तक यह मुद्दा दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग की सबसे बड़ी चुनौती बना रहेगा।
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