चंडीगढ़। अगर पहले बच्चों को आंखों का ट्यूमर, रतौंधी या इससे जुड़ी कोई अन्य समस्या हो तो अगली प्रेगनेंसी में जेनेटिक काउंसलिंग जरूर कराएं। इसके माध्यम से समय रहते गर्भ में पल रहे बच्चे में आने वाली समस्या का पता लगाकर समुचित इलाज किया जा सकता है।
काउंसलिंग में माता-पिता से मिली जानकारी के आधार पर और जांच से यह पता लगाया जाता है कि बीमारी का कारण बनने वाला जीन कहां से आया है और बच्चों को गंभीर मर्ज से बचाने का इलाज भी तय किया जाता है। यह बातें पीजीआई के एडवांस आई सेंटर के प्रमुख प्रोफेसर एस एस पांडव ने शुक्रवार को पीजीआई में आयोजित एईसी-पीजीआई ओक्यूलर जेनेटिक्स वर्कशॉप में कहीं।
उन्होंने बताया कि गर्भ में पल रहे बच्चे में कई बार अनुवांशिक कारणों से कई तरह की समस्या शुरू हो जाती है। जिसका असर अलग-अलग तरह से पड़ता है। अगर आंखों की बात करें तो आंखों में ट्यूमर यानी रेटिनोब्लास्टोमा, रतौंधी और ऐसे ही अन्य समस्याओं के साथ ही ऑप्टिकल नर्व ठीक से न बनने जैसी प्रक्रिया होती है। ऐसे में अगर जेनेटिक काउंसलिंग को माध्यम बनाया जाए तो इस एरिया में काम करके जन्म लेने वाले बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाया जा सकता है।
प्रोफेसर पांडव ने बताया कि मौजूदा समय में जेनेटिक के क्षेत्र में काफी कम काम हो रहा है। इसलिए ऐसे आयोजन के माध्यम से जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जा रहा है। दो दिवसीय सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों ने भाग लेकर नेत्र रोगों से जुड़ी जेनेटिक्स पर चर्चा की।
प्रो. अमोद गुप्ता मुख्य अतिथि रहे और प्रो. जगत राम व प्रो. एम.आर. डोगरा विशिष्ट अतिथि थे। मुख्य वक्ताओं में क्लीवलैंड क्लिनिक फाउंडेशन अबू धाबी के प्रो. आरिफ खान और यूएसए के चिल्ड्रेन हॉस्पिटल की जेनेटिक काउंसलर हन्ना स्कांगा शामिल रहीं। कार्यक्रम में रेटिना, ग्लॉकोमा, कॉर्निया, ऑन्कोलॉजी और पीडियाट्रिक नेत्र विज्ञान में जेनेटिक रिपोर्ट की उपयोगिता पर सत्र हुए।