सरकार की लाख कोशिश के बावजूद पंजाब के किसानों का धान की खेती से मोहभंग नहीं हो रहा है, इसकी सबसे बड़ी वजह पंजाब में धान की सरकारी खरीद है। पंजाब के पानी व पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार फसली विभिन्नता का शोर तो डाल रही है लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को मक्की की खेती के लिए जागरूक ही नहीं किया जा रहा है। यही वजह है कि इस सीजन में भी पंजाब में खेती के कुल रकबे में 87 फीसदी से अधिक पर धान की खेती की उम्मीद जताई जा रही है।
यह भी पढ़ें: पंजाब पुलिस को बड़ी सफलता: लुधियाना से 8.49 करोड़ की डकैती के पांच आरोपी काबू, 60 घंटे के अंदर सुलझा मामला
हालांकि किसी समय पंजाब मक्की उत्पादन का गढ़ माना जाता था लेकिन साल 2022-23 में खरीफ के समय पंजाब में कुल 3.59 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल पर फसलों की बुवाई की गई, इसमें से धान की बुवाई 3.13 मिलियन हेक्टेयर में हुई। जबकि पंजाब में मक्की की मांग के मुकाबले उत्पादन काफी कम है। खरीफ सीजन के दौरान मक्की 1973-74 तक पंजाब में सबसे महत्वपूर्ण फसल हुआ करती थी, जब इसकी खेती 5.67 लाख हेक्टेयर (हेक्टेयर) में की जाती थी जबकि धान (परमल और बासमती मिलाकर 4.99 लाख हेक्टेयर पर उगाई जाती थी।
धान की सरकारी खरीद क्या शुरू हुई पंजाब के किसानों ने पंजाबी व हवा की चिंता छोड़कर अपना ध्यान धान की खेती पर केंद्रित कर दिया। 2021-22 के दौरान पंजाब में धान 31.45 लाख हेक्टेयर रहा। इसके विपरीत मक्की का रकबा 1.05 लाख हेक्टेयर रह गया। होशियारपुर और रूपनगर जिलों में धान के तहत 96 प्रतिशत और 92 प्रतिशत क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है।
पंजाब ऐसा राज्य है जहां भूजल दोहन सबसे ज्यादा होता है। पंजाब में जितना भूजल निकाला जाता है उसका 97 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई में खर्च होता है। इसमें भी सबसे बड़ा हिस्सा धान की सिंचाई का है। केंद्रीय रिपोेर्ट के मुताबिक, पंजाब में भूजल निकाला जाता रहा तो उसके पास सिर्फ 17 सालों के लिए यानी 2039 तक के लिए ही पानी है, लेकिन इस साल भी पंजाब में धान का रकबा कम होने के स्थान पर बढ़ने की उम्मीद है।
मक्की को प्रमोट करने की योजना 21 साल पहले शुरू हुई लेकिन अटक गई
अक्तूबर 2002 में पंजाब सरकार ने एक कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग योजना लांच कर एसएस जौहल की अगुवाई में साल 2002 में बनी एक और कमेटी के सुझावों के मुताबिक, इस योजना का मकसद फसलों में विविधता लाना और अगले पांच सालों में गेहूं-धान की खेती में से 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल कम करना था। पंजाब सरकार के कृषि विभाग, पंजाब एग्रो फूडग्रेन्स कॉरपोरेशन (पीएएफसी) और निजी कंपनियों ने संयुक्त रूप से लगभग 29 हजार एकड़ गेहूं-धान की फसल की जगह पर वैकल्पिक फसलों की बुवाई के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। पीएएफसी ने बड़ी और नामी-गिरामी कंपनियों से खरीदे गए बीज उपलब्ध करवाएलेकिन जब इन कॉन्ट्रैक्टेड फसलों के तैयार होने का समय आया तो यह योजना ही गड़बड़ हो गई। खराब मौसम और खराब क्वालिटी के बीजों की वजह से मक्का की लगभग पूरी की पूरी फसल ही खराब हो गई। किसी भी कंपनी ने तैयार फसल को नहीं खरीदा।
मक्की पर मुनाफा बढ़ सकता है ..
धान के रकबे को मक्की में बदलने से बिजली सब्सिडी (4160 रुपये/एकड़) और धान की पराली को संभालने की लागत (2975 रुपये/एकड़) की भी बचत होगी। कृषि विशेषज्ञ प्रो. हरी सिंह के मुताबिक, मक्की के बाद बोई गई गेहूं की उपज में लगभग 1.6 क्विंटल प्रति एकड़ की वृद्धि होगी जिससे लगभग 3155 रुपये प्रति एकड़ की अतिरिक्त आय होगी। इस प्रकार कुल बचत और अतिरिक्त आय लगभग 10290 रुपये प्रति एकड़ होगी, जो मक्की की बिजाई करने वाले किसानों को दी जाए तो पंजाब में पानी व बिजली की बचत होगी और पराली से छुटकारा मिल जाएगा।