फिरोजपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस पिछले 29 सालों से हार का सामना करने के बाद भी सबक सीखने को तैयार नहीं है। चुनावी शंखनाद हो चुका है, लेकिन अभी तक पार्टी ने अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है। दूसरी तरफ शिअद का चुनाव प्रचार युद्ध स्तर पर जारी है।
1957 से लेकर 2009 तक कुल 6 बार अकाली दल के सांसदों ज्ञान सिंह, महेन्द्र सिंह साईयांवाला, गुरदास सिंह बादल, जोरा सिंह मान और शेर सिंह घुबाया ने विजय हासिल की है। इनमें से जोरा सिंह मान केवल ऐसे प्रत्याशी रहे जिन्हाेंने लगातार तीन बार जीत हासिल की है।
1957 के चुनावों में कांग्रेस के अबोहर के गांव किल्लियांवाली निवासी इकबाल सिंह जाखड़ ने सीपीआई के वधावाराम को 47 हजार से अधिक वोटों से पराजित किया।
1962 के चुनावों में कांग्रेस ने फिर इकबाल सिंह को प्रत्याशी बनाया और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी जनसंघ के कुलवीर सिंह को करीब 32 हजार वोटों से पराजित किया। लगातार दो बार सत्ता में रहने के बाद फिरोजपुर सीट से कांग्रेस का ग्राफ गिरने लगा।
1967 में एडीएस के उम्मीदवार ने कांग्रेस के जे. नाथ को करीब 12 हजार वोटों से मात दी। दो वर्ष बाद भंग हुई लोकसभा के 1969 में हुए चुनावों में शिरोमणि अकाली दल के गुरदास बादल ने कांग्रेस के जे. सिंह को करीब 52 हजार से अधिक वोटों से शिकस्त देकर फिरोजपुर सीट पर कब्जा किया।
हालांकि 1971 के चुनावों में कांग्रेस के मोहिंद्र सिंह गिल ने शिअद के गुरचरण सिंह को उतने ही वोटों से हराया। 1977 में मोहिंद्र सिंह साईयांवाला को शिअद से प्रत्याशी बनाया गया और उन्होंने कांग्रेस के मोहिंद्र सिंह गिल को करीब 20 हजार मतों से पराजित किया।
1980 के चुनावों में बलराम जाखड़ कांग्रेस के प्रत्याशी बने और उन्हाने शिअद के इकबाल सिंह को करीब 1 लाख 94 हजार से भी अधिक मतों से पराजित कर अकाली दल का किला ध्वस्त किया। 1985 में हुए चुनावों में फिरोजपुर सीट से गुरदियाल सिंह ढिल्लाें ने शिअद के इंद्रजीत सिंह को करीब 43 हजार से भी अधिक मतों से मात दी। 1989 के चुनावों में आजाद उम्मीदवार के रूप में आए ध्यान सिंह मंड ने कांग्रेस के जगमीत सिंह बराड़ को करीब 33 हजार मतों से पराजित किया।
इसी प्रकार से 1992 में बहुजन समाज पार्टी के मोहन सिंह फलियांवाला ने कांग्रेस के पंजाब सरकार के पूर्व मंत्री संतोष सिंह रंधावा को एक हजार के आंशिक अंतर से पराजित पूरे लोकसभा क्षेत्र में सनसनी फैला दी। इन चुनावों में अबोहर के अधिकतर कांग्रेसियों ने बसपा के उम्मीदवार मोहन सिंह फलियांवाला की मदद कर आपसी फूट को सरेआम उजागर कर दिया।
1996 के चुनावों में मोहन सिंह फलियांवाला ने सुनील कुमार जाखड़ को करीब 60 हजार मतों से पटकनी दी। दो वर्ष बाद दोबारा चुनाव हुए जिसमें शिअद बादल की ओर से स. जोरा सिंह मान को उम्मीदवार बनाया। जिन्होंने बसपा के मोहन सिंह फलियांवाला को करीब 45 हजार से अधिक मतों से पराजित किया। एक वर्ष बाद 1999 में हुए चुनावों में कांग्रेस-बसपा गठबंधन टूटने से कांग्रेस ने हंसराज जोसन को अपना उम्मीदवार बनाया।
इसमें शिअद के जोरा सिंह मान ने जोसन को करीब 15 हजार मतों से हराया। 2004 के चुनावों में शिअद की ओर से जोरा सिंह मान फिर मैदान में आए जिनको हराने के लिए कांग्रेस ने जगमीत सिंह बराड़ को मैदान में उतारा लेकिन मान असंतुष्ट कांग्रेसियों के सहयोग से करीब 12 हजार मतों से जगमीत बराड़ को हराकर तीसरी बार सांसद बने। 1998 से लेकर 2004 तक लगातार फिरोजपुर सीट से अकाली दल के घटते वोटर ग्राफ को देखते हुए 2009 के चुनावों में अकाली दल ने बिरादरी का पत्ता खेलते हुए स. शेर सिंह घुबाया को मैदान में उतारा।
जिन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार स. जगमीत सिंह बराड़ को करीब 20 हजार मतों के अंतर से पराजित किया। फिरोजपुर सीट से लगातार 25 साल तक हार का सामना करने के बाद भी कांग्रेस ने कोई सीख नहीं ली। चुनावी शंखनाद के बावजूद कांग्रेस ने पंजाब में अभी तक अपने उम्मीदवाराें की घोषणा नहीं की है।