महाभारत कथा को एक खास अंदाज में गाने वाली पंडवानी (पांडव वाणी) शैली की पुरोधा तीजन बाई चाहती थीं कि देश की युवा पीढ़ी, खासकर गायन क्षेत्र में आगे बढ़ने वाले इस पंडवानी शैली को भी सीखें और इसे जिंदा रखें। अपने इस सपने का जिक्र उन्होंने करीब 18 साल पहले हरियाणा के अंबाला जिले में एक कार्यक्रम के दौरान किया था।
स्टेज पर जैसे ही तीजन की प्रस्तुति आगे बढ़ती गई, माहौल ऐसा था कि बस पंडाल में तीजन की आवाज व श्रोताओं की तालियों की गूंज के बीच और कुछ नहीं था। तीजन का अभिनय, संवाद, गायन के दौरान उनकी भाव-भंगिमाएं और नाटकीय प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया था। श्रोताओं के सामने तीजन ने महाभारत के कई प्रसंग अपनी खास शैली में प्रस्तुत कर उन्हें भावुक कर दिया था।
प्रस्तुति खत्म होने के बाद कुछ पलों तक लगातार बजती श्रोताओं की तालियां मानो तीजन का दिल खोलकर आभार व्यक्त कर रही हों।
अंबालवियों का ऐसा प्यार देखकर तीजन भी काफी उत्साहित और भावुक थीं। तीजन ने मंच पर सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि वे चाहती हैं कि इस पंडवानी शैली का देश में खूब प्रचार हो। संगीत शिक्षा से जुड़े युवा इस शैली को सीखने के प्रति अपनी रुचि बढ़ाएं और इस शैली के साथ आगे बढ़ते हुए सदैव इसे जिंदा रखें।