पठानकोट के गुरप्रीत सिंह को अब सिंचाई के लिए खेत में जाकर जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती। वह स्मार्ट फोन से अपने खेत में लगे सिंचाई के सिस्टम को ऑपरेट करते हैं। जितना पानी चाहिए उतना ही इस्तेमाल करते हैं। उनका मानना है कि ड्रोन और स्मार्ट इरिगेशन ने फसल की गुणवत्ता में सुधार लाया है। सरकार की ट्रेनिंग से हम नई तकनीकों को अपना रहे हैं। वह अकेले किसान नहीं हैं जो कृषि में आधुनिक तकनीक अपना रहे हैं।
पंजाब में खेती में अब एआई (कृत्रिम बुद्धिमत्ता), ड्रोन, इंटरनेट ऑफ थिंग्स सेंसर और डेटा-आधारित सलाह का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। किसान मोबाइल एप और एसएमएस व व्हाट्सएप की सलाह से मौसम, कीट और फसल की स्थिति रियल टाइम में समझ रहे हैं। इससे लागत घटती है और उत्पादन बढ़ता है। यह नया रुझान छोटे एवं मझोले किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है।
ड्रोन अब केवल निगरानी के लिए नहीं बल्कि प्लांटेशन स्प्रेइंग, पौधों की एनालिसिस और फसल स्वास्थ्य सर्वे में इस्तेमाल हो रहे हैं। कृषि विभाग और निजी कंपनियों ने कई जिलों में ड्रोन आट-स्प्रेइंग प्रोग्राम चलाए हैं, जिससे कीटनाशकों और पानी की बचत होती है। किसान इसे भविष्य की खेती मशीन कहते हैं।
केंद्रीय कृषि विभाग एआई-आधारित चैटबोट किसान ई-मित्र और नेशनल पेस्ट सर्विलांस सिस्टम चला रहा है जिससे किसान अपनी भाषा में सलाह और कीट पहचान सेवाएं पा रहे हैं। इसका लाभ पंजाब के किसानों तक पहुंच रहा है जिससे फसलों के नुकसान को कम किया जा रहा है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) ने डिजिटल इनोवेशन, एआई, रोबोटिक्स और डेटा साइंस में पीजी डिप्लोमा और एमटेक जैसे पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। इसका उद्देश्य कृषि-प्रौद्योगिकी में माहिर युवाओं को तैयार करना है जो अगले दशक में किसानों के लिए तकनीकी समाधान विकसित करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कृषि कौशल क्रांति की नींव है।
सरकार स्मार्ट प्रिसिजन फार्मिंग कार्यक्रम को प्रोत्साहित कर रही है जो जीपीएस, ड्रोन, सेंसर और डेटा एनालिटिक्स के साथ खेत-स्तर पर इनपुट (पानी, खाद, कीटनाशक) को सबसे उपयुक्त मात्रा में उपयोग करता है। इससे उत्पादन में वृद्धि और संसाधन की बचत होती है।
पानी-संवर्धन पंजाब की प्राथमिकता है। पंजाब की नई कृषि नीति के अनुसार स्मार्ट सिंचाई प्रणालियों जैसे सेंसर-आधारित ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन को बढ़ावा मिल रहा है जो भू-जल संरक्षण और शुष्क मौसम में भी फसल निर्भरता कम करते हैं। पानी की दक्षता बढ़ने से किसान लागत बचा रहे हैं और स्थिर उत्पादन पा रहे हैं। लेजर लेवलिंग और पानी की नालियों का पक्का निर्माण से जल संरक्षण और उत्पादन वृद्धि सुनिश्चित की जा रही है। यह तकनीक विशेष रूप से भू-जल संकट वाले इलाकों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पश्चिमी कृषि संरचना से हटकर राज्य अब फसल विविधीकरण पर जोर दे रहा है। बाजार-आधारित फसल, जैसे दलहन, तिलहन तथा मसालेदार फसलें, अपनाने से किसान आय में वृद्धि की उम्मीद रखते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि यह रणनीति कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा।
पंजाब सरकार कृषि-मंडी को मॉडल कृषि मॉल में बदलने की योजना पर काम कर रही है जहां किसान सीधे मशीनरी, बीज, सलाह और मार्केट सूचना प्राप्त करेंगे। इससे बिचौलिये हटेंगे और मूल्यों में पारदर्शिता आएगी। यह कदम किसान आय को बढ़ाने में सहायक होगा। राज्य सरकार और पंजाब एग्री एक्सपोर्ट कॉर्पोरेशन जैसे संगठनों की ओर से ऑनलाइन विपणन नेटवर्क विकसित करने के प्रयास कर रहे हैं जिससे किसान सीधे उपभोक्ता तक पहुंच सकें।
सरकार ग्रीन ट्रैक्टर योजना के तहत अत्याधुनिक ट्रैक्टर व कृषि मशीनरी पर भारी सब्सिडी उपलब्ध करवा रही है। इससे बड़े और छोटे किसान दोनों अपनी खेती में मैकनाइजेशन लाकर समय और मेहनत बचा रहे हैं। यह नई मशीनें फसल की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ाती हैं। केंद्र सरकार के कृषि यांत्रिकीकरण उप-मिशन के अंतर्गत किसानों को ड्रोन व अन्य मशीनरी पर सब्सिडी दी जा रही है। इससे छोटे किसान भी उच्च तकनीकी उपकरणों तक पहुंच पा रहे हैं। इससे किसान आत्मनिर्भर बनेंगे।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विज्ञान केंद्रों की ओर से तकनीकी प्रशिक्षण, डेमो और फील्ड-लेवल सलाह दी जा रही है जिससे किसान नई तकनीक को अभ्यास में ला रहे हैं। पंजाब में इन सेवाओं को बढ़ाने से ज्ञान-आधारित निर्णय लेने की क्षमता मजबूत हुई है।
पंजाब में जैविक कृषि को संस्थागत समर्थन मिल रहा है। किसानों को जैविक प्रमाणन, स्टोरेज और ब्रांडिंग नेटवर्क प्रदान कर फाइव रिवर्स जैसे ब्रांड के तहत स्थानीय व निर्यात बाजारों में सामग्री भेजी जा रही है। ब्लॉकचेन और डेटा ट्रैसेबिलिटी से गुणवत्ता और उपभोक्ता विश्वास बढ़ता है।
सरकार कृषि अनुसंधान को पुनर्निर्मित कर जलवायु-मित्र, धीमी अवधि वाली और उच्च उत्पादन वाली फसल किस्मों पर केंद्रित है। इन प्रोजेक्टों से मिट्टी की सेहत, कीट नियंत्रण और पिक तकनीक में सुधार सुनिश्चित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह किसानों की आय में स्थिर वृद्धि लाएगा।
कई युवा इंजीनियर और कृषि स्नातक खेती को आधुनिक उद्यम के रूप में अपना रहे हैं। राज्य में इंटर्नशिप प्रोग्राम, ट्रेनिंग और नवाचार कार्यक्रम किसानों और युवा को डिजिटल व तकनीकी कृषि कौशल प्रदान करते हैं जिससे रोजगार और नवाचार की लहर फैल रही है।
सरकार कृषि उत्पाद संगठनों द्वारा बिक्री नेटवर्क, विकेंद्रीकृत मार्केट हब और कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं पर निवेश कर रही है, जिससे किसान फ़सल को उचित मूल्य पर बेच सकते हैं और भंडारण नुकसान कम होता है। साथ ही मुख्य बीमा योजनाओं को डिजिटल रूप से जोड़कर जोखिम-प्रबंधन को मजबूत किया जा रहा है।
संगरूर के पनवां गांव की प्रभजोत कौर केंद्र सरकार की ड्रोन दीदी योजना के माध्यम से ड्रोन पायलट बनकर न केवल अपना परिवार पाल रही हैं बल्कि इलाके की सैकड़ों महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही हैं। प्रभजोत कौर आजकल आसपास के गांवों में जाकर ड्रोन की मदद से कृषि कार्यों में किसानों की मदद कर रही हैं। उम्मीद फाउंडेशन के प्रोजेक्ट भैणा दी उम्मीद के साथ जुड़ने के बाद प्रभजोत के जीवन बड़ा बदलाव आया है। प्रभजोत कौर बताती हैं कि उम्मीद संस्था के जुड़कर उन्होंने गुरुग्राम में पहले ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के बाद उन्हें ड्रोन ड्राइविंग पायलट का लाइसेंस मिला। इसके बाद उम्मीद फाउंडेशन की मदद से उन्हें ड्रोन और किट मिली। इसके बाद प्रभजोत ने ड्रोन को अपनी आजीविका का साधन बना लिया है। अब वह आसपास के गांवों में जाकर किसानों की कृषि कार्यों में मदद कर रही है जिसकी एवज में उसे 300 रुपये प्रति एकड़ मिलता है। फसल के सीजन के दिनों में वह रोजाना औसतन 10 से 15 एकड़ जमीन में स्प्रे समेत कई तरह के कार्य करती है। उम्मीद फाउंडेशन के संस्थापक एवं पूर्व विधायक अरविंद खन्ना बताते हैं कि संस्था के माध्यम से इस क्षेत्र में प्रभजोत समेत तीन लड़कियों को ड्रोन पायलट का प्रशिक्षण दिया गया है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने डिजिटल एग्रीकल्चर की ओर एक और कदम बढ़ाया है। यूनिवर्सिटी ने एक ऐसी तकनीक को विकसित किया है जो न केवल किसानों को थकाऊ मेहनत करने से बचाएगा बल्कि खेती को किफायती भी बनाएगा। लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पीएयू) ने हाल ही में एक खास तरह के ड्राइवर-असिस्टेड ट्रैक्टर तकनीक को पेश किया है। यह तकनीक किसी ड्राइवरलेस ट्रैक्टर की तरह काम करती है। एक बार डाटा फीड करने के बाद इसे चलाने के लिए किसी ड्राइवर या चालक की जरूरत नहीं होगी। ये ट्रैक्टर पहले से ही फीड किए गए डाटा के अनुसार खेतों में खुद ही जुताई करता रहेगा, जिससे न केवल खेती आसान होगी बल्कि इससे पैसों की बचत के साथ-साथ पर्यावरण में होने वाले कार्बन उत्सर्जन को भी कम किया जा सकेगा।
पैदावार बढ़ रही लेकिन किसान की आय नहीं
दविंदर शर्मा, कृषि अर्थशास्त्री
पंजाब समेत देशभर में कृषि क्षेत्र में पैदावार तो बढ़ी है लेकिन आय नहीं बढ़ रही। किसान को कंज्यूमर प्राइस का 10 से 30 प्रतिशत ही किसानों को मिल पा रहा है। 70 प्रतिशत कमाई बिचौलिये कर रहे हैं। सरकार भी पैदावार बढ़ाने पर ही जोर दे रही है। इसके बहाने तीन कृषि कानूनों को वापस लाने की तैयारी है। कृषि में बदलाव का एक ही रास्ता है। किसानों की आय बढ़ाई जाए। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने नेचुरल फार्मिंग में बीएससी एग्रीकल्चर के डिग्री कोर्स शुरू करने की पहल की है। यह एक अच्छी शुरुआत है। तकनीक का इस्तेमाल गलत नहीं है लेकिन यह कृषि की मूल समस्या को समझना जरूरी है।