हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता ने सुनवाई की छह तारीखों में से तीन पर छूट मांगी थी, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह जानबूझकर अनुपस्थित था या मुकदमे में बाधा डाल रहा था। किसी भी कदाचार या कार्यवाही से बचने के जानबूझकर प्रयास के अभाव में जमानत रद्द करना याचिकाकर्ता के प्रक्रियात्मक अधिकारों पर अनुचित है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि मुकदमे के दौरान कुछ सुनवाई तिथियों पर उपस्थिति से छूट मांगना, अपने आप में किसी अभियुक्त को दी गई जमानत को रद्द करने का आधार नहीं है।
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धोखाधड़ी के एक मामले में जमानत रद्द करने को चुनौती देने वाली याचिका पर हाईकोर्ट सुनवाई कर रहा था। मूल रूप से बठिंडा निवासी याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अभियुक्त-याचिकाकर्ता जमानत पर रिहा है और मुंबई का निवासी होने के नाते, उसने पहले भी छूट के लिए आवेदन दायर किए थे जिन्हें स्वीकार कर लिया गया था।
अगली सुनवाई पर याचिकाकर्ता उपस्थित हुआ था। कार्यवाही आगे बढ़ी और उसकी ओर से छूट के लिए एक आवेदन दायर किया गया जिसे अस्वीकार कर दिया गया और निचली अदालत ने पाया कि छह सुनवाइयों में से, याचिकाकर्ता तीन तारीखों पर अनुपस्थित रहा। परिणामस्वरूप, छूट का अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया और उसकी जमानत रद्द कर दी गई।
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हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता ने सुनवाई की छह तारीखों में से तीन पर छूट मांगी थी, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह जानबूझकर अनुपस्थित था या मुकदमे में बाधा डाल रहा था। किसी भी कदाचार या कार्यवाही से बचने के जानबूझकर प्रयास के अभाव में जमानत रद्द करना याचिकाकर्ता के प्रक्रियात्मक अधिकारों पर अनुचित है। कोर्ट ने याची को निचली अदालत के समक्ष उपस्थित होने और सुनवाई की प्रत्येक तिथि पर उपस्थित होने का वचन देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत को उनकी जमानत रद्द करने के स्थान पर उन्हें व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट देनी चाहिए थी और अगली तारीख पर उपस्थित होने का निर्देश देना चाहिए था।