अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नाइपर एक स्वायत्त संस्था है और केंद्रीय सिविल सेवा नियमों के अधीन नहीं आती। संस्थान ने केंद्र सरकार के एक परिपत्र का हवाला देते हुए वेतन कटौती को सही ठहराया था, लेकिन अदालत ने पाया कि वही मंत्रालय इस मामले में स्वयं को पक्षकार मानने से इंकार कर चुका है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मोहाली के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्युटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (नाइपर) को आदेश दिया है कि वह विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) पीजेपी सिंह वड़ैच को उनके समस्त बकाया वेतन, भत्ते और सेवा संबंधी लाभ तीन माह के भीतर दिया जाए।
विज्ञापन
2011 में भारतीय वायुसेना से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद याची को नाइपर में रजिस्ट्रार नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के बाद वेतन से उनकी पेंशन की राशि काटी जाने लगी। यह कटौती 14 वर्षों के बाद 2023 में शुरू की गई, जिसे लेकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। जस्टिस विनोद एस भारद्वाज की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि वड़ैच की नियुक्ति पुनर्नियुक्ति न होकर नई नियुक्ति थी। उनके वेतन से पेंशन की कटौती करना अवैध है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नाइपर एक स्वायत्त संस्था है और केंद्रीय सिविल सेवा नियमों के अधीन नहीं आती। संस्थान ने केंद्र सरकार के एक परिपत्र का हवाला देते हुए वेतन कटौती को सही ठहराया था, लेकिन अदालत ने पाया कि वही मंत्रालय इस मामले में स्वयं को पक्षकार मानने से इंकार कर चुका है। कोर्ट ने कहा कि यह एक न्यायिक आदेश की अवहेलना करने का प्रयास है। अदालत ने आदेश दिया कि यदि तीन माह के भीतर सभी देनदारियां पूरी नहीं की गईं, तो संस्थान को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित भुगतान करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि नियुक्ति पत्र की शर्तों को एकतरफा बदला नहीं जा सकता और सेवा लाभों में कोई कटौती अनुचित है।