हरपाल चीमा ने कहा कि पंजाब यूनिवर्सिटी 1882 में लाहौर में स्थापित हुई थी और विभाजन के बाद यह पंजाब के हिस्से में आई। 59 साल पहले सीनेट और सिंडिकेट की स्थापना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हुई थी, जिसमें शिक्षकों और विभिन्न वर्गों से चुने गए प्रतिनिधि शामिल होते थे।
पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने केंद्र सरकार पर पंजाब विश्वविद्यालय को केंद्रीकृत करने और उसके लोकतांत्रिक ढांचे को खत्म करने का आरोप लगाया है।
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उन्होंने कहा कि 18 अक्तूबर को केंद्र द्वारा जारी नोटिफिकेशन तानाशाही की दिशा में बढ़ता कदम है। इस नोटिफिकेशन के माध्यम से शिक्षा को केंद्रीकृत किया जा रहा है और क्षेत्रीय भाषाओं को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।
चीमा ने कहा कि पंजाब यूनिवर्सिटी 1882 में लाहौर में स्थापित हुई थी और विभाजन के बाद यह पंजाब के हिस्से में आई। 59 साल पहले सीनेट और सिंडिकेट की स्थापना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हुई थी, जिसमें शिक्षकों और विभिन्न वर्गों से चुने गए प्रतिनिधि शामिल होते थे। लेकिन अब सीनेट की संख्या घटाकर 31 कर दी गई है, जिनमें से केवल 18 सदस्य चुने जाएंगे जबकि बाकी केंद्र द्वारा मनोनीत होंगे। यह यूनिवर्सिटी के लोकतंत्र पर सीधा हमला है।
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उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार शिक्षा संस्थानों को अपने नियंत्रण में लाने की साजिश कर रही है। केंद्र ने वीसी को भी मनोनीत करने का अधिकार दे दिया है और सिंडिकेट के सदस्य भी अब केंद्र के माध्यम से तय होंगे।
चीमा ने पंजाब भाजपा नेताओं रवनीत बिट्टू, सुनील जाखड़ और अश्विनी शर्मा से मांग की कि वे इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करें और इस्तीफा दें। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कानूनी लड़ाई लड़ेगी, राष्ट्रपति से अपील करेगी और जरूरत पड़ी तो सड़कों से लेकर संसद तक विरोध किया जाएगा।