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हाईकोर्ट का फैसला: सेना से सात साल में ही अमान्य होकर निकाला गया था जवान, विधवा को 42 साल बाद पेंशन का हक

Fri, 18 Sep 2026 09:21 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

होशियारपुर निवासी विधवा ने करीब 42 साल बाद अपने पति के पेंशन संबंधी अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की थी। मामला ऐसे सैनिक का है, जो 18 अगस्त 1971 को भारतीय सेना में भर्ती हुआ था।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सेना से महज सात साल की सेवा के बाद अमान्य होकर बाहर किए गए जवान की विधवा की पेंशन का रास्ता चार दशक से अधिक समय बाद साफ कर दिया है। 
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अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि सैनिक ने दस साल की न्यूनतम अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी, उसे अमान्य पेंशन के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामले में सैनिक की होशियारपुर निवासी विधवा ने करीब 42 साल बाद अपने पति के पेंशन संबंधी अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की थी। मामला ऐसे सैनिक का है, जो 18 अगस्त 1971 को भारतीय सेना में भर्ती हुआ था। वर्ष 1978 में उसे सेना से अमान्य घोषित कर सेवा से बाहर कर दिया गया था। उसे उस समय अमान्य ग्रेच्युटी और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी का भुगतान किया गया था। 
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बाद में उसकी विधवा ने अपने पति को मिलने वाले पेंशन लाभ का दावा किया। केंद्र सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि सैनिक ने दस साल की अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी। इसके अलावा सरकार ने यह भी आपत्ति उठाई कि विधवा ने पेंशन के लिए करीब 42 साल की देरी से दावा किया।

हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि कानून की स्थापित स्थिति के अनुसार अमान्य पेंशन के लिए दस साल की सेवा पूरी होना अनिवार्य बाधा नहीं है। अदालत ने मामले में पेंशन अधिकार को केवल देरी के आधार पर खत्म करने के बजाय लागू पेंशन नियमों और पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को महत्व दिया। 
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