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चुनावी लहर के गणित ने बदलीं सरकारें: मुद्दे बने सत्ता की सीढ़ी, दलों के लिए मुद्दों से जुड़ी लहर रहती असरदार

Sun, 11 Oct 2026 11:41 AM IST
Sharukh Khan मोहित धुपड़, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

पंजाब में चुनावी लहर के गणित ने सरकारें बदलीं हैं। मुद्दों ने सत्ता की सीढ़ी बनाई है। विधानसभा चुनाव में दलों के लिए मुद्दों से जुड़ी लहर असरदार रहती है। साल 2022 में भी इसी लहर का लाभ आप को मिला है। पहली बार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी।
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Punjab Elections - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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पंजाब में चुनाव के दौरान पारंपरिक सियासत और समीकरणों से ज्यादा राजनीतिक मुद्दों से जुड़ी लहर और मतदाताओं का मूड असरदार रहता है। पिछले करीब तीन दशकों में हुए विधानसभा चुनावों का रुझान देखें तो चुनावी लहर के गणित ने सूबे में सरकारें बदलीं और मुद्दों ने सत्ता की सीढ़ी बनाई।
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साल 1997 और 2022 के विधानसभा चुनावों में इसका सबसे ज्यादा लाभ शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन और आम आदमी पार्टी को मिला। दोनों ने पंजाब के चुनावी इतिहास में रिकॉर्ड कायम किए। साल 1997 में पहली बार किसी गठबंधन ने 117 में से कुल 93 सीटें जीती थीं। इनमें अकाली दल को 75 और भाजपा को 18 सीटें मिली थीं।

इसी तरह, साल 2022 में सत्ता विरोधी लहर के साथ-साथ आम आदमी पार्टी ने वादों और मुद्दों के जरिये सूबे में बदलाव की ऐसी लहर खड़ी की, जिसने पहली बार पार्टी को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाया और भगवंत सिंह मान मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में भी रिकॉर्ड बना। 
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पंजाब के चुनावी इतिहास में आप 92 सीटें जीतने वाली पहली ऐसी पार्टी बनी, जिसने बिना किसी गठबंधन के यह आंकड़ा हासिल किया। इस दौरान मतदाताओं में पारंपरिक दलों कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के खिलाफ बदलाव की लहर दिखी। 

नतीजतन, विभिन्न सीटों पर सियासत के दिग्गज धराशायी हो गए और मतदाताओं ने सत्ता की चाबी आप के हाथों में सौंप दी। बेअदबी के मामले, नशा तस्करी, रोजगार की कमी और विभिन्न सुविधाएं मुफ्त उपलब्ध कराने की गारंटियां इस दौरान प्रमुख मुद्दे बने।

 

पूर्व सीएम कैप्टन को दो बार मिला मौका
विभिन्न मुद्दों से जुड़ी चुनावी लहर ने साल 2002 और 2017 में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को भी सत्ता तक पहुंचाया। साल 2002 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर का फायदा मिला। 
 

प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल और बदलाव की मांग जैसे मुद्दे चुनाव में अहम रहे। कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और 117 में से 62 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। 

 

अकाली दल 41 सीटों पर सिमट गया। साल 2017 में भी कांग्रेस के पक्ष में सत्ता परिवर्तन की लहर उठी। अकाली-भाजपा गठबंधन के 10 साल के शासन के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल, नशे का मुद्दा, बेरोजगारी और किसानों की कर्ज की समस्या ने मतदाताओं को प्रभावित किया। 

 

कैप्टन ने कर्ज माफी और बदलाव का भरोसा दिया। नतीजतन, कांग्रेस ने 117 में से 77 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि आम आदमी पार्टी को 20 और अकाली-भाजपा गठबंधन को 18 सीटें मिलीं।

प्रकाश सिंह बादल ने बनाया रिकॉर्ड
साल 2007 में कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर, पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और बदले की राजनीति के आरोपों ने अकाली-भाजपा गठबंधन के लिए सत्ता में वापसी का रास्ता बनाया। शिरोमणि अकाली दल की सस्ते आटे-दाल की योजना, किसानों को मुफ्त बिजली और कल्याणकारी योजनाओं के वादों ने भी मतदाताओं को आकर्षित किया। 
 
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इसी तरह, साल 2012 में सत्ता विरोधी लहर का असर बेअसर साबित हुआ। सूबे में विकास, स्थिरता, शांति और जनकल्याणकारी योजनाओं के बूते प्रकाश सिंह बादल ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर पंजाब के सियासी इतिहास में रिकॉर्ड बनाया।
 
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