सामान्य हार्मोन टेस्ट से आगे, इनहिबिन-बी देगा सटीक संकेत
अध्ययन में बताया गया है कि अभी तक इस्तेमाल होने वाली कई जांचें, जैसे सामान्य हार्मोन टेस्ट, हर मामले में पूरी तरह सटीक साबित नहीं होतीं। ऐसे में डॉक्टरों को यह तय करने में परेशानी होती है कि बच्चे को केवल निगरानी में रखा जाए या इलाज शुरू किया जाए। इसी समस्या के समाधान के तौर पर इनहिबिन-बी को महत्वपूर्ण बायोमार्कर माना जा रहा है। लड़कों में यह हार्मोन वृषण (टेस्टिस) की कोशिकाओं और लड़कियों में अंडाशय की छोटी फॉलिकल्स से बनता है। प्यूबर्टी शुरू होने के साथ इसका स्तर बढ़ने लगता है, जिससे यह शरीर के विकास का संकेत देता है।
अस्थायी देरी है या गंभीर बीमारी, नया टेस्ट बताएगा सही वजह
अध्ययन में यह भी सामने आया कि केवल सामान्य इनहिबिन-बी जांच के बजाय एफएसएच और जीएनआरएच की मदद से किया जाने वाला स्टिम्युलेटेड इनहिबिन-बी टेस्ट ज्यादा भरोसेमंद परिणाम दे सकता है। इससे डॉक्टर बेहतर तरीके से यह समझ पाएंगे कि समस्या अस्थायी है या लंबे समय तक रहने वाली बीमारी का संकेत है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार माता-पिता घबराकर अनावश्यक इलाज शुरू करवा देते हैं, जबकि कुछ मामलों में गंभीर बीमारी होने पर उपचार शुरू करने में देरी हो जाती है। ऐसे में सही समय पर सही पहचान बेहद जरूरी है।
कब सतर्क हो जाएं माता-पिता?
13 साल की उम्र तक बेटी में प्यूबर्टी शुरू न हो।
14 साल की उम्र तक बेटे में बदलाव शुरू न हों।
आठ साल से पहले लड़कियों में शारीरिक बदलाव शुरू हो जाएं।
नौ साल से पहले लड़कों में बदलाव दिखने लगें।
बच्चे की लंबाई अचानक बढ़नी बंद हो जाए।
बच्चा आत्मविश्वास की कमी या मानसिक तनाव महसूस करने लगे।
विशेषज्ञों की सलाह
बच्चों की ग्रोथ पर नियमित नजर रखें।
दूसरे बच्चों से तुलना न करें।
बिना डॉक्टर की सलाह के हार्मोनल दवाएं न दें।
किसी भी असामान्य बदलाव पर एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से संपर्क करें।
समय पर पहचान होने से भविष्य की कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव संभव है।