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PGI Study: किशोरावस्था में देरी को न करें नजरंदाज, समय से करवाएं इनहिबिन-बी हार्मोन की जांच; होगी सटीक पहचान

Wed, 24 Jun 2026 03:46 PM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

कई बार कुछ बच्चों में प्यूबर्टी थोड़ी देर से शुरू होती है और बाद में सब कुछ सामान्य हो जाता है। वहीं, कुछ बच्चों में यह समस्या जन्मजात हार्मोन संबंधी बीमारी से जुड़ी हो सकती है। दोनों स्थितियों के शुरुआती लक्षण काफी हद तक एक जैसे होते हैं, इसलिए सही पहचान करना आसान नहीं होता।
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puberty in kids - फोटो : AI
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विस्तार
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अगर 13-14 साल की उम्र तक बच्चों में किशोरावस्था (प्यूबर्टी) के सामान्य बदलाव शुरू नहीं हो रहे हैं या बहुत कम उम्र में ही शरीर में बदलाव दिखाई देने लगे हैं तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। 

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पीजीआई के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की विशेषज्ञ डॉ. रमा वालिया समेत अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक समीक्षा में सामने आया है कि इनहिबिन-बी नामक हार्मोन की जांच ऐसे मामलों में बीमारी और सामान्य विकास के बीच सही अंतर बताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह अध्ययन क्लिनिकल इंडोक्राइनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आज सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि यह पता लगाया जाए कि बच्चे में हो रही देरी सामान्य है या किसी गंभीर हार्मोन संबंधी बीमारी का संकेत है। विशेषज्ञों के अनुसार कई बार कुछ बच्चों में प्यूबर्टी थोड़ी देर से शुरू होती है और बाद में सब कुछ सामान्य हो जाता है। वहीं, कुछ बच्चों में यह समस्या जन्मजात हार्मोन संबंधी बीमारी से जुड़ी हो सकती है। दोनों स्थितियों के शुरुआती लक्षण काफी हद तक एक जैसे होते हैं, इसलिए सही पहचान करना आसान नहीं होता।

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सामान्य हार्मोन टेस्ट से आगे, इनहिबिन-बी देगा सटीक संकेत

अध्ययन में बताया गया है कि अभी तक इस्तेमाल होने वाली कई जांचें, जैसे सामान्य हार्मोन टेस्ट, हर मामले में पूरी तरह सटीक साबित नहीं होतीं। ऐसे में डॉक्टरों को यह तय करने में परेशानी होती है कि बच्चे को केवल निगरानी में रखा जाए या इलाज शुरू किया जाए। इसी समस्या के समाधान के तौर पर इनहिबिन-बी को महत्वपूर्ण बायोमार्कर माना जा रहा है। लड़कों में यह हार्मोन वृषण (टेस्टिस) की कोशिकाओं और लड़कियों में अंडाशय की छोटी फॉलिकल्स से बनता है। प्यूबर्टी शुरू होने के साथ इसका स्तर बढ़ने लगता है, जिससे यह शरीर के विकास का संकेत देता है।

अस्थायी देरी है या गंभीर बीमारी, नया टेस्ट बताएगा सही वजह

अध्ययन में यह भी सामने आया कि केवल सामान्य इनहिबिन-बी जांच के बजाय एफएसएच और जीएनआरएच की मदद से किया जाने वाला स्टिम्युलेटेड इनहिबिन-बी टेस्ट ज्यादा भरोसेमंद परिणाम दे सकता है। इससे डॉक्टर बेहतर तरीके से यह समझ पाएंगे कि समस्या अस्थायी है या लंबे समय तक रहने वाली बीमारी का संकेत है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार माता-पिता घबराकर अनावश्यक इलाज शुरू करवा देते हैं, जबकि कुछ मामलों में गंभीर बीमारी होने पर उपचार शुरू करने में देरी हो जाती है। ऐसे में सही समय पर सही पहचान बेहद जरूरी है।

कब सतर्क हो जाएं माता-पिता?

13 साल की उम्र तक बेटी में प्यूबर्टी शुरू न हो।
14 साल की उम्र तक बेटे में बदलाव शुरू न हों।
आठ साल से पहले लड़कियों में शारीरिक बदलाव शुरू हो जाएं।
नौ साल से पहले लड़कों में बदलाव दिखने लगें।
बच्चे की लंबाई अचानक बढ़नी बंद हो जाए।
बच्चा आत्मविश्वास की कमी या मानसिक तनाव महसूस करने लगे।

विशेषज्ञों की सलाह

बच्चों की ग्रोथ पर नियमित नजर रखें।
दूसरे बच्चों से तुलना न करें।
बिना डॉक्टर की सलाह के हार्मोनल दवाएं न दें।
किसी भी असामान्य बदलाव पर एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से संपर्क करें।
समय पर पहचान होने से भविष्य की कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव संभव है।
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