तीन में से एक विधायक ने पार्टी छोड़ी, दूसरा नाराज
पार्टी के तीन विधायकों में एक डॉ. सुक्खी पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। दूसरे विधायक मनप्रीत अयाली नाराज चल रहे हैं और पार्टी से किनारा कर चुके हैं। वहीं अब तीसरी विधायक बीबी गन्नीव कौर मजीठिया के पति बिक्रम सिंह मजीठिया को अकाली दल की तरफ से नोटिस दिया जा रहा है। लिहाजा, पार्टी अगर मजीठिया के खिलाफ कार्रवाई करती है तो विधानसभा में अकाली का प्रतिनिधित्व शून्य हो जाएगा। पार्टी के समक्ष चुनौतियां बाहरी व अंदरूनी दोनों हैं, जिनसे निकलना अकाली दल बादल के लिए आसान नहीं होगा।
कई दिग्गज पहले ही बगावती
पार्टी के दिग्गज सुखदेव सिंह ढींडसा, प्रेम सिंह चंदूमाजरा, बीबी जागीर कौर, सुच्चा सिंह छोटेपुर, गुरप्रतार सिंह वडाला, सिकंदर सिंह मलूका जैसे वरिष्ठ अकाली नेता बगावत की राह पर हैं। उनकी मांग है कि पार्टी प्रधान को कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। पार्टी के कई सीनियर नेता अलविदा कह चुके हैं। डिंपी ढिल्लो आप से विधायक बन चुके हैं। जबकि सुखबीर के जीजा आदेश प्रताप कैरों को पार्टी से निकाल दिया गया है।
पंथक वोट से ही बनाते रहे हैं सरकार
पंथक सियासी माहिरों का कहना है कि अकाली दल हमेशा पंथक वोट के आधार पर सरकार बनाता रहा है। 1996 में अकाली दल ने भाजपा और फिर बसपा के साथ गठबंधन किया। 1997 के विधानसभा चुनाव जीत कर प्रकाश सिंह बादल सूबे के मुख्यमंत्री बन गए। बादल ने पांच बार बतौर मुख्यमंत्री सूबे की कमान संभाली। इस दौरान उन्होंने 2008 में पार्टी की अध्यक्षता अपने बेटे सुखबीर सिंह बादल को सौंप दी। पार्टी की तरफ से एसजीपीसी पर पूरा वर्चस्व बनाकर रखा गया। किसी भी पंथक लीडर को हावी नहीं होने दिया। एसजीपीसी के प्रधान गुरचरण सिंह टोहड़ा तक को अलग थलग कर दिया।
2015 के बाद से खिसक रहा पंथक वोट
2015 के बाद से अकाली दल के लिए पंथक वोट बैंक खिसकता जा रहा है। बेअदबी की घटनाओं के बाद अकाली दल के भीतर व बाहर काफी रोष फैल चुका है। दस साल में अकाली दल संकट से नहीं निकल पाया है। 2017 में अकाली दल 25.4 फीसदी वोट पर आ गया और 117 में से 15 सीट मिली। जबकि 2022 में अकाली दल 18.5 फीसदी वोट पर गया और महज तीन सीट मिली। हालांकि अकाली दल बसपा का गठबंधन था।